नयी दिल्ली, 22 जुलाई 2025. कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव
शाहनवाज़ आलम ने मुंबई हाईकोर्ट द्वारा 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों में
मकोका अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए बेगुनाहों के बरी कर दिए जाने का
स्वागत करते हुए सुप्रीम कोर्ट से निर्दोषों को फंसाने वाले अधिकारियों के
ख़िलाफ कार्यवाई करने और पीड़ितों को मुआवजा देने की मांग की है.
शाहनवाज़
आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल
ट्रेनों में हुए विस्फोटों में 189 लोगों की जान गई थी और 824 लोग घायल हुए
थे. इस मामले में मुंबई पुलिस, मुंबई क्राइम ब्रांच, एटीएस और एनआइए ने
देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाने के लिए बेगुनाह मुस्लिम युवकों को
फंसाया. जिन्हें मकोका की एक विशेष अदालत ने 2015 में 12 में से 5 को फांसी
और 7 को उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी थी. लेकिन अब मुंबई हाईकोर्ट ने सभी को
बरी कर दिया है.
उन्होंने
कहा कि मकोका के तहत एसपी से ऊपर रैंक के पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया
इक़बालिया बयान सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है. जिसका मतलब है कि
इन बेगुनाह मुस्लिमों को फंसाने में मुंबई पुलिस के तत्कालीन वरिष्ठ
अधिकारी शामिल थे जिन्होंने इन्हें टॉर्चर करके झूठे बयान लिए थे. जिन्हें
हाईकोर्ट ने अब ख़ारिज कर दिया. ऐसे में न्यायालय को इन बेगुनाह लोगों को
फंसाने में शामिल अधिकारीयों के साथ ही मकोका जज के ख़िलाफ भी कार्यवाई
करनी चाहिए जिसने पुलिस की फ़र्ज़ी थ्योरी पर आंख मूँद कर भरोसा किया और
बेगुनाहों को फांसी और उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी.
शाहनवाज़
आलम ने कहा कि बिना ज़मानत के 19 साल जेल में बंद रखकर इन 12 लोगों,
जिनमें से एक की मौत हो चुकी है की ज़िन्दगी पुलिस और न्यायपालिका के
साम्प्रदायिक तत्वों के गठजोड़ ने बर्बाद किया है. जिसका हर्जाना दिए बिना
राज्य अपनी निष्पक्ष छवि को दुबारा बहाल नहीं कर सकता.
शाहनवाज़
आलम ने इस घटना की नए सिरे से जांच की मांग करते हुए आरएसएस, अभिनव भारत,
ख़ुफ़िया और सुरक्षा एजेंसियों में घुसपैठ कर चुके इन संगठनों के स्लीपर
सेल्स को जांच के दायरे में लाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि यह
आश्चर्य की बात है कि 2006 की इस घटना की जांच कर रही एजेंसियां बेगुनाह
मुस्लिमों को फंसाने के लिए झूठी कहानियाँ गढ़ती रहीं लेकिन उसी समय समझौता
एक्सप्रेस विस्फोट, मालेगांव, हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए आतंकी
हमलों के दोषी हिंदुत्ववादी सांगठनों को जांच के दायरे से ही बाहर रखा.
जिससे यह साबित होता है कि कथित जांच का मकसद दोषियों को पकड़ने के बजाये
मुस्लिम समाज की छवि ख़राब करना था.
उन्होंने
कहा कि इनमे से कुछ अभियुक्तों का मुकदमा लड़ रहे युवा वकील शाहिद आज़मी की
2010 में कुर्ला स्थित उनके दफ़्तर में गोली मारकर की गयी हत्या की जांच
भी अब नए सिरे से होनी चाहिए. क्योंकि इन बेगुनाहों को फंसाने वाले लोगों
का सम्बन्ध उनकी हत्या से हो सकता है.
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