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आगामी विधानसभा चुनाव मे सीकर जिले मे माकपा उम्मीदवार व उनके क्षेत्रों मे बदलाव आ सकता है। कामरेड अमरा राम के चुनाव लड़ने के सम्भावित क्षेत्रो पर अन्य दलो के नेताओं की नजर।


                ।अशफाक कायमखानी।
सीकर।

                  पीछले दो दशको से राजस्थान मे वामपंथियों का  मजबूत किला कहलाने वाले सीकर जिले की भूमि के लाल कामरेड अमरा राम के नेतृत्व मे जनहित मे किये गये आंदोलनों से राज्य व केन्द्र सरकार को अनेक दफा झूकना पड़ा है।लगातार चार चुनाव जीतकर विधायक बनने वाले अमरा राम के 2013 व 2018 के लगातार दो चुनाव हारने से वामपंथ जिले मे पहले के मुकाबले सूस्त होता नजर आया है। माकपा की राष्ट्रीय कमेटी के निर्णय अनुसार अब जिले के पुराने माकपा उम्मीदवारों व उनके क्षेत्रों मे बदलाव आना तय है। जिससे 2023 के आम विधानसभा चुनाव मे माकपा मे कुछ नया नजर आ सकता है।
                      जिले की जनता व कुछ राजनेता संघर्ष के प्रतीक कामरेड अमरा राम को जनहित के मुद्दों को ताकत देने के लिये उन्हें विधानसभा मे देखना चाहते है। पर उनके लिये सूरक्षित सीट जो पहले धोद थी। उसके 2008 मे आरक्षित होने के बाद वो दांतारामगढ़ से चुनाव लड़कर एक दफा विधायक बने थे। लेकिन उसके बाद वो दो चुनाव दांतारामगढ़ से हार रहे है। 2023 के चुनाव मे वो दांतारामगढ़ से चुनाव लड़ते है या फिर अन्य जगह से लड़ते है। यह समय आने पर देखना होगा। पर अन्य दलो के कुछ नेता अपने से अधिक अमरा राम के कदम पर नजर गढाये हुये है।
                     सूत्र बताते है कि माकपा की राष्ट्रीय समिति के निर्णय अनुसार पीछले विधानसभा चुनाव मे पांच हजार से कम मत प्राप्त करने वाले माकपा उम्मीदवार को 2023 के विधानसभा चुनाव मे उम्मीदवार नही बनाया जायेगा। वही पार्टी चुनाव के एक साल पहले उम्मीदवार को अंदर खाने तय करके उसको चुनावी तैयारी मे लगने को कह दिया जायेगा। पांच हजार से कम मत पाने वाले निर्णय के मुताबिक जिले के सीकर से उम्मीदवार रहे कय्यूम कुरेशी व फतेहपुर से उम्मीदवार रहे आबिद अली उम्मीदवारी से दूर चले जायेगे। 2018 के विधानसभा चुनाव मे कय्यूम को 1676 व आबिद को 3931 मत ही मिल पाये थे। इनके अलावा लक्ष्मनगढ उम्मीदवार बिजेंद्र मील को 8617 मत मिले थे। पर उन्हें 2013 के चुनाव मे पांच हजार से भी काफी कम मत मिले थे। 2023 के विधानसभा चुनाव मे लक्ष्मनगढ से भी माकपा उम्मीदवार के बदले जाने की सम्भावना बताई जा रही है।
            2018 के विधानसभा चुनाव मे जिले मे धोद से माकपा के उम्मीदवार पेमा राम को सबसे अधिक मत 61089 आये थे। फिर कामरेड अमरा राम को 45186 व सुभाष नेहरा को 16378 मत आये थे। उनके बाद मील, आबिद व कुरेशी का नम्बर आता है।
             कोमरेड अमरा राम वर्तमान मे माकपा की राष्ट्रीय समिति के सदस्य के अलावा राज्य सचिव के पद पर भी कार्यरत है। क्षेत्र की जनता व  विभिन्न राजनीतिक दलो के नेताओं की नजर अमरा राम के 2023 के विभिन्न सम्भावित चुनाव लड़ने के क्षेत्रों पर टिकी हुई है। अनेक तरह के कयास लगाये जा रहे है कि अमरा राम अब दांतारामगढ़ की बजाय लक्ष्मनगढ से चुनाव लड़ सकते है। कुछ लोग दांतारामगढ़ व लक्ष्मनगढ के साथ खण्डेला व सीकर विधानसभा क्षेत्र से लड़ने के कयास भी लगा रहे है। पर अमरा राम ने अभी तक अपने पत्ते नही खोले है।
                    कुल मिलाकर यह है कि जिले मे माकपा उम्मीदवार जब जब चुनाव जीता है तब तब उसे कांग्रेस के एक धड़े का भरपूर समर्थन मिला है। माकपा को जीतने के लिये अतिरिक्त मतो की आवश्यकता होती है। जो कांग्रेस का एक धड़ा मदद कर देता है तो वो जीत जाते है। वरना उम्मीदवार अपने पार्टी का वोट प्राप्त करके तसल्ली कर लेता है। जिले मे वर्तमान मे कांग्रेस के जनाधार वाले चौधरी नारायण सिंह व सुभाष महरिया एक साथ नजर आ रहे। इन्हीं के साथ दीपेन्द्र सिंह शेखावत खड़े नजर आते है। बाकी कांग्रेस विधायकों का असर अपने क्षेत्र के बाहर ना के बराबर है। धोद विधायक परशराम मोरदिया का अपने क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्र के दलित मतदाताओं पर भी देखा जाता है।



 

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