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उत्तर प्रदेश-पंजाब चुनाव के बाद राजस्थान मे मुख्यमंत्री गहलोत व प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा बदले जायेगे! पायलट के नही बनाने पर गहलोत के अड़ जाने पर किसान या ब्राह्मण को मुख्यमंत्री व दलित या आदिवासी को अध्यक्ष बनाया जा सकता है।


               ।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।

              मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व सचिन पायलट मे जारी राजनीति वर्चस्व की जंग को अपनी जीत मे बदलने का दावा मंत्रीमंडल विस्तार के बाद दोनो नेताओं द्वारा करके अपने अपने समर्थकों का उत्साह बनाये रखने के बावजूद मुख्यमंत्री के प्रति उपजे विधायकों व अन्य दिग्गज नेताओं मे असंतोष को दबाने के प्रयास मुख्यमंत्री समर्थक लगातार कर रहे है। फिर भी अंदर ही अंदर विधायकों व समर्थकों मे असंतोष की लगी आग कभी भी ज्वालामुखी बनकर फट सकती है।
                  पंजाब के तत्तकालीन मुख्यमंत्री केप्टन अमरिंदर सिंह को एक झटके मे बदलने की प्रियंका गांधी की रणनीति सफल होने के बाद वहां दलित कार्ड खेलने से कांग्रेस के पूर्ण बहुमत से सत्ता मे वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। गहलोत को सत्ता मे रीपीटर नही मानने के चलते अगले साल शुरुआत मे होने वाले पांच राज्यों के चुनाव के बाद (बजट सत्र के बाद) मुख्यमंत्री पद से गहलोत व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से डोटासरा को बदला जाना तय है। गहलोत को केन्द्र मे बडी जिम्मेदारी दी जा सकती है। वही डोटासरा की छुट्टी की जायेगी।
                    हालांकि मंत्रीमंडल विस्तार व बदलाव व महंगाई हटाओं रैली के सफल आयोजन के बाद मुख्यमंत्री खेमा अपने आपको मजबूत होना मानकर चलने लगा है। फिर भी पंजाब की तरह आम मतदाता से हाईकमान को मिल रहे लगातार फीडबैक के बाद गहलोत को बदलना सैद्धांतिक तोर पर तय हो गया बताते है। गहलोत अपने खास समर्थकों को अधीकांश संवैधानिक पदो पर मनोनीत कर चुके है। वही अब तमाम तरह की राजनीतिक नियुक्तियों पर अपने समर्थक नेताओं को मनोनीत करने मे सफल हो सकते है। साथ ही वो अपना पद छोड़ने के समय चाहे सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद पाने से रोक पाये। उस स्थिति मे सीपी जोशी या हरीश चोधरी के सर सेहरा बंद सकता है। वही प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी  दलित या आदिवासी नेता (परशराम मोरदिया -रघुवीर मीणा) को दी जा सकती है।
                कांग्रेस के ऐजेण्डे से अल्पसंख्यक बाहर होने के बाद कांग्रेस उन्हें भाजपा को हराने की मजबूरी के चलते अपने आप उनकी तरफ खींचें आना मानकर कांग्रेस अब भाजपा की तरह हिन्दू कार्ड खेलकर वो अपने अन्य परम्परागत मतदाता किसान-दलित-पीछड़ा व आदिवासियों पर फोकस करने की कोशिश करेगी। साथ मे राहुल गांधी व प्रियंका गांधी अपने आपको ब्राह्मण बताकर ब्राह्मण मतो को नेहरू-इंदिरा राज की तरह राज चलाने की कहकर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश करेंगे।
                 जानकर बताते है कि राहुल व प्रियंका अब कांग्रेस मे उम्रदराज नेताओं को धीरे धीरे जिम्मेदारी से दूर करके नये लोगो को आगे बढाने की कोशिश करते लगते है। आज मुम्बई के सामना अखबार मे छपे एक लेख से स्पष्ट भी होता है कि राहुल गांधी अब वरिष्ठ नेताओं को कांग्रेस द्वारा बहुत कुछ देने की बात कहते हुये उन्हें अलग भूमिका मे रखना चाहते है। वो अब प्रमुख भूमिका मे नई पीढी को लाना चाहते है। जिसकी पंजाब मे चरनजीत सिंह चन्नी को आगे लाकर शुरुआत करदी है।
          बताते है कि सचिन पायलट को केन्द्र की राजनीति से प्रदेश अध्यक्ष बनाकर राजस्थान भेजते समय शीर्ष नेता ने उन्हें मुख्यमंत्री बनानै का वादा किया था। पायलट उस वादे को पुरा करने का दवाब हाईकमान पर बना रहे है। लेकिन गहलोत की गठजोड़ व दिल्ली मे उनके पक्ष मे मजबूत कोकस एवं  निर्दलीय विधायकों का सरकार को मिल रहे समर्थन के कारण पायलट के पक्ष मे फैसला नही हो पा रहा है। बताते है कि गहलोत राजनीति मे अपने विरोधियों से हिसाब चुकता करने के माहिर है। वो उनको रिपलेस करने के समय आखिर तक पायलट को मुख्यमंत्री पद से दूर रखने की भरपूर कोशिश करेगे। जिसमे वो सफल भी हो सकते है।
               विधायकों मे उपजे असंतोष को दबाये रखने के लिये मुख्यमंत्री उन्हें किसी ना किसी रुप मे खुश रखने की पहले अपने दो कार्यकाल की तरह भरपूर कोशिश कर रहे है। लेकिन वो पायलट व उनके समर्थक विधायकों मे उपजे असंतोष को अभी तक दबा नही पाये है। केवल मात्र विधायकों पर ही फोकस करने के साथ साथ अपने समर्थक सेवानिवृत्त नौकरशाहों को संवैधानिक पदो पर मनोनीत करने के चलते लोकसभा के सभी पच्चीस कांग्रेस उम्मीदवारों मे से अधिकांश उम्मीदवारो की वर्तमान सरकारी तंत्र मे कोई वोइस नही होने से उनमे मुख्यमंत्री की कार्यशैली के प्रति असंतोष पनप रहा है। वो समय समय पर विभिन्न माध्यमों से अपनी बात हाईकमान तक पहुंचाने मे लगे है। मुख्यमंत्री गहलोत बजट सत्र के पहले पहले बचे संवेधानिक पदो के अलावा अधीकांश राजनीतिक पदो पर अपने समर्थकों को मनोनीत करने मे प्रयासरत है। इसके अलावा अगले साल राजस्थान मे चार राज्यसभा सदस्यों के लिए चुनाव होने है। जिनमे से वर्तमान हालात के अनुसार तीन कांग्रेस व एक भाजपा का सदस्य जीत सकते है। लेकिन कांग्रेस के तीसरे उम्मीदवार के जीतने के लिये निर्दलीय विधायकों का समर्थन कांग्रेस को मिलना आवश्यक है। तो निर्दलीय विधायकों के समर्थन पाने के दवाब मे गहलोत अपनी पसंद से एक उम्मीदवार तय करने का दवाब बना सकते है। दो उम्मीदवार हाईकमान की पसंद से तय हो सकते है।
                      कुल मिलाकर यह है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद या फिर विधानसभा के बजट सत्र के बाद राजस्थान मे मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर चेहरे बदले बदले नजर आ सकते है। दलित-आदिवासी-पीछड़ा व ब्राह्मण नेताओं  पर फोकस किया जा सकता है। कांग्रेस हर मुमकिन 2023 मे प्रदेश मे कांग्रेस सरकार को रीपीट होना देखना चाहती है।





 

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