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भारत मे आजादी के बाद मुस्लिम राजनीतिक लीडरशिप उभर नही पाने के मुस्लिम समुदाय स्वयं जिम्मेदार!


         मुस्लिम समुदाय जज्बाती तकरीरो व विभिन्न राजनीतिक दलो द्वारा उभारे गये कथित मुस्लिम नेताओं के नाम पर खुश होता रहा।
                      ।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।

                    आजादी के बाद भारत के मुस्लिम समुदाय के लिये मजबूत राजनीतिक लीडरशिप का उभर नही पाने के बडे जिम्मेदार स्वयं मुस्लिम समुदाय ही माना जा सकता है। जबकि एक राजनीतिक दल ने तो आधारहीन व सेक्यूलर के नाम पर अब्दुल करीम छागला व हिदायतुल्लाह जैसे एवं उन जैसी सोच वाले अनेक नेताओं को समय समय पर उभारा तो कुछ दलो ने जज्बाती तकरीर करने वाले व माफिया गिरीं करने वाले नेताओं को उभारा। सभी राजनीतिक एक बात पर आम सहमत नजर आये कि जनाधार व साफ सुथरी छवि वाली लीडरशिप या तो उभरे नही , किसी वजह से अगर उभर जाये तो उसको जल्द से जल्द निपटा दिया जाये। इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय की बडी तंजीमे जमात ए इस्लामी व जमीयत उलेमा ए हिंद ने सालो तक राजनीति को हराम बताते हुये मतदान व राजनीति से दूर रहने की कहने से चुके नही। अब जाकर जमात ए इस्लामी ने वैलफेयर पार्टी आफ इण्डिया नामक राजनीति पार्टी बनाई व इसी जमात से इख्तेलाफ होने पर केरल के कुछ लोगो ने एसडीपीआई नामक राजनीतिक दल वैलफेयर पार्टी से पहले बनाया है। जिनको अभी तक किसी भी स्तर पर पूरी तरह स्वीकारिता नही मिल पाई है। जमीयत उलेमा हिंद सीधे तौर पर ना सही पर बाये दाये से वर्तमान मे राजनीति करती नजर आती है। इन सबके उलट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तरबियती वर्कर सभी राजनीतिक दलो मे मोजूद है। वही कहते है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज भाजपा को तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही अपने तरीके से चलाता है। यूपी मे पीस पार्टी, उलेमा कोंसिल सहित भारत के अन्य राज्यों मे अलग अलग नाम से कुछ दल बने पर वो चल नही पाये।
                          चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सीधे तौर पर राजनीति ना करता होगा लेकिन उन्होंने अपने लोगो को तरबियत करने मे तीन-चार पीढियों को खपा कर आज अपनी चहती पार्टी भाजपा को भारत मे सत्ता के शीर्ष मुकाम पर पहुंचाया है। जबकि मुस्लिम तंजीमे वर्कर को तरबियत करने मे अभी ढाई पावंडे भी नही चल पाये है। पीछले कुछ सालो से केरल मे मुस्लिम लीग अपना जनाधार खोने लगी है। जबकि मोलाना बदरुद्दीन अजमल आसाम के कुछ हिस्से तक मोजूद है। असदुद्दीन आवैसी तेलंगाना के हैदराबाद के बाहर राज्य मे अन्य मुस्लिम बहुल जगह अपने उम्मीदवार खड़े नही करते है जिनमें से कुछ जगह से वो जीत भी सकते है। जबकि वो तेलंगाना व आंध्रप्रदेश के बाहर चुनाव के ठीक पहले जाकर मुस्लिम बहुल सीटें पर उम्मीदवार खड़े करने की कोशिश करते है। जहां जहां चुनाव होने वाले है। कुछ राजनीतिक दलो मे दिखावे के तौर पर अलग अलग समय पर अलग अलग लोगो को मुस्लिम लीडरशिप के नाम पर उभरते होने की उस राजनीतिक दल के सर्वेसर्वा नेता दिखावे के तौर पर समुदाय को चकमा देने की कोशिश जरुर करते है। जबकि ऐसे मुस्लिम लीडर के निचे वास्तव मे जमीन नही होती है।
                       कुछ साजिशो के तहत मुस्लिम समुदाय को शिक्षा व सियासी तौर पर जागरूक होने से दूर रखने के लिये आजादी के तूरंत बाद से कभी दंगो व कभी किसी संगठन का डर दिखाकर उन्हें वोटबैंक के तौर पर उलझाये रखा। वही कथित मुस्लिम लीडरशिप उस दल के नेताओं के झांसे मे उलझे रहने को आतूर रहे। मुस्लिम तंजीमो ने कभी कभार किसी मुस्लिम मुद्दे पर तो आवाज उठाई लेकिन दलित-आदिवासी, पिछड़े व अन्य तरह से प्रताडित होने वाले वर्ग के लिये उस तरह से संघर्ष नही किया जिस तरह से उनको करना चाहिए था।
               भारत मे चल रहे वर्तमान राजनीतिक हालात मे मुस्लिम समुदाय सभी राजनीतिक दलो के लिये खुले तौर पर या पर्दे के पीछे अछूत बनता नजर आ रहा है। उनके इंसाफ व हक की बात करने से राजनीतिक दल कतराने लगे है। समुदाय मे डर व दहसत का माहोल बनाने मे चाहे कम ज्यादा लेकिन अधीकांश दलो ने काम किया व कर रहे है।कोई वोटबैंक बनाने व बनाये रखने के लिये तो कोई इनको टारगेट करके बहुसंख्यक समुदाय को भावनात्मक रुप से अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये लगातार कोशिश कर रहे है।
               मुस्लिम समुदाय के हितो पर चोट पहुंचाने के समय संसद व विधानसभा मे मुस्लिम के नाम पर राजनीतिक दलो से टिकट लेकर जीतकर जाने वाले अधीकांश जनप्रतिनिधियों की जबान पर दही जमा नजर आता है। वही वो सदन के बाहर अपने दल के शीर्ष नेतृत्व को हक बात करने से भी कोशो दूर नजर आते है। भारत भर मे वर्तमान मे यही हालात कायम है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान मे मदरसा पैरा टीचर्स व उर्दू टीचर्स के चल रहे अनशन, धरना व प्रदर्शन को लेकर एक भी मुस्लिम विधायक शीर्ष नेतृत्व से डर व लालच के मारे बात तक नही चला पा रहा है। गहलोत सरकार के गठन के साथ पहले मंत्रीमंडल मे मात्र एक मंत्री बनाकर उसे अल्पसंख्यक मामलात विभाग तक सिमित रखना, महाधिवक्ता व अतिरिक्त महाधिवक्ता मनोनयन से समुदाय को दूर रखा, फिर राजस्थान लोकसेवा आयोग के सदस्य मनोनयन सहित विभिन्न संवेधानिक पदो के मनोनयन से दूर रखने के अलावा सम्बंधित बोर्ड-निगम का अभी तक गठन नही होना।
                   कुल मिलाकर यह है कि राजनीतिक तौर पर सत्ता पर अपने तरबियत याफ्ता लोगो को बैठाकर सत्ता चलाने के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पीढियों को खफा देने के साथ सेंकड़ो सालो की उनकी मेहनत का नतीजा बताया जा रहा है। जबकि मुस्लिम समुदाय की किसी भी तंजीम ने राजनीतिक तौर पर वर्कर की तरबियत करने का काम हाथ मे नही ले रखा है। वो हथेली पर सरसू उगाना चाहते है। जबकि कुछ राजनीतिक दल मुस्लिम को वोटबैंक बनाने या बनाये रखने के लिये हर मुमकिन कोशिश करते नजर आते है। तो कुछ दल मुस्लिम को टारगेट करके बहुसंख्यक समुदाय को अपनी तरफ आकर्षित करते नजर आ रहे है। पर मुस्लिम समुदाय या उनकी तंजीमो को इस पर मंथन तो करना चाहिए।

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