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सीकर जिले की कांग्रेस-भाजपा व माकपा राजनीति मे धीरे धीरे बनते नये गठजोड से आगे चलकर काफी कुछ बदलने की सम्भावना नजर आने लगी है।



                 ।अशफाक कायमखानी।
सीकर।

                   जिले मे तीसरी ताकत के रुप मे मोजूद राजनीतिक दल माकपा के दिग्गज नेता व धोद व दांतारामगढ़ से विधायक रहे संघर्ष के प्रतीक कामरेड अमरा राम ने चाहे स्वयं ने संकेत नही दिये लेकिन अल्पसंख्यक व किसान मतदाता उन्हे आगामी विधानसभा चुनाव मे लक्ष्मनगढ से उम्मीदवार के तौर पर देख कर चल रहे है। वेसे भी माना जाता है कि माकपा उम्मीदवार जिले मे तब ही विधानसभा चुनाव जीत पाते है जब कुछ हद तक उन्हें कांग्रेस के कुछ नेता दिल खोलकर मत दिलवाने मे मदद करे। माकपा के दुसरे पूर्व विधायक कामरेड पेमाराम का आरक्षित सीट धोद से चुनाव लड़ना ही तय है। बाकी जगह अपने मत अपने निशान पर डलवाने के लिये उम्मीदवार मैदान मे उतारे जाते रहे है। वर्तमान समय मे पार्टी स्तर पर कामरेड अमरा राम द्वारा किये जाने वाले निर्णय पर ही सीकर जिले मे संगठन की मोहर लगती है।
             पूर्व केन्द्रीय मंत्री तत्तकालीन समय मे कांग्रेस जोईन करने वाले नेता सुभाष महरिया ने 2018 के विधानसभा चुनाव मे जिले के सभी कांग्रेस उम्मीदवारों को जीताने मे जी-जान लगाकर मेहनत करके जिले से भाजपा व माकपा का सफाया करने मे सफलता पाने व आगे चलकर 2023 के होने वाले आम विधानसभा चुनाव मे रहने वाली उनकी भूमिका के मुताबिक उनके प्रभाव का वर्तमान समय मे आंकलन करना अभी मुश्किल है। यह समय आने पर ही उनकी चुप्पी टूटने के साथ ही पता चल पायेगा। कांग्रेस के सभी सात विधायकों का अपने अपने क्षेत्र मे अपना अपना व पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण प्रभाव व अस्तित्व है। लेकिन उन सातो कांग्रेस विधायकों मे समन्वय की टूटती डोर की झलक जिला परिषद चुनाव मे साफ देखने को मिली। जैसेतैसे करके जिला प्रमुख का उम्मीदवार तो कांग्रेस ने खड़ा कर दिया था। पर वो सब मिलकर उप जिलाप्रमुख के उम्मीदवार के नाम पर सहमत होकर उसको मैदान मे उतार तक नही पाये। मंत्री डोटासरा व निर्दलीय विधायक महादेव सिंह की जारी युगलबंदी मे भी पीछले महीने से दरार नजर आने लगी है। वही अभी तक विधायक हाकम अली तो शिक्षा मंत्री डोटासरा के साथ नजर आ रहे है। पर इस मित्रता के आगे विधानसभा चुनाव तक बने रहने पर शंका की लकीर खिंचती नजर आने लगी है।
     


     

 भाजपा मे जिले मे पूर्व विधायक झाबरसिंह खर्रा को छोड़कर अधीकांश नेताओ पर पूर्व विधायक प्रैमसिंह बाजोर का प्रभाव है। जिलाप्रमुख भी बाजोर ने अपनी पूत्रवधु को बनवा कर अपनी ताकत व प्रभाव का अहसास करवा दिया है।लक्ष्मनगढ प्रधान चुनाव मे भाजपा जीती हुई बाजी अपने जिले के दिग्गज नेताओं की उदासीनता व आपसी समनव्यता की कमी के कारण हार गई।
       


         

कुल मिलाकर यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव आते आते कांग्रेस-भाजपा व माकपा की राजनीति व नेतृत्व मे अनेक बदलाव नजर आयेगे। वर्तमान समय मे अंदर ही अंदर काफी कुछ सांठगांठ व बनते नये गठजोड एवं एक दुसरे को मात देने की नेताओं की मंशा होने के बावजूद जनता को वर्तमान मे नजर नही आ रहा है वो सब धीरे धीरे जमीन पर नजर आने लगेगा। वही कामरेड अमरा राम अगर लक्ष्मनगढ से 2023 का विधानसभा चुनाव लड़ते है तो वहां चुनावी मुकाबला जरूर दिलचस्प होगा।


 

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