सरकारी स्तर पर महिला सशक्तिकरण के लिये मिलने वाले "महिला सशक्तिकरण अवार्ड" मे वाहिद चोहान मात्र वाहिद पुरुष। - वाहिद चोहान की शेक्षणिक जागृति के तहत बेटी पढाओ बेटी पढाओ का नारा पूर्ण रुप से क्षेत्र मे सफल माना जा रहा है।



                ।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।

             हर साल आठ मार्च को विश्व भर मे महिलाओं के लिये अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। लेकिन महिलाओं को लेकर इस तरह के मनाये जाने वाले अनगिनत समारोह को वास्तविकता का रुप दे दिया जाये तो निश्चित ही महिलाओं के हालात ओर अधिक बेहतरीन देखने को मिल सकते है। इसके विपरीत राजस्थान के सीकर के लाल व मुम्बई प्रवासी वाहिद चोहान ने महिलाओं का वास्तव मे सशक्तिकरण करने का बीड़ा उठाकर अपने जीवन भर का कमाया हुया सरमाया खर्च करके वो काम किया है जिसकी मिशाल दूसरी मिलना मुश्किल है।इसी काम के लिये राजस्थान सरकार ने वाहिद चोहान को महिला सशक्तिकरण अवार्ड से नवाजा है। बताते है कि इस तरह का अवार्ड पाने वाले एक मात्र पुरुष वाहिद चोहान ही है।
                  करीब तीस साल पहले सीकर शहर के रहने वाले वाहिद नामक एक युवा जो बाल्यावस्था मे मुम्बई का रुख करके वहां उम्र चढने के साथ कड़ी मेहनत से भवन निर्माण के काम से अच्छा खासा धन कमाने के बाद ऐसों आराम की जिन्दगी जीने की बजाय उसने अपने आबाई शहर सीकर की बेटियों को आला तालीमयाफ्ता करके उनका जीवन खुसहाल बनाने की जीद लेकर पहले अंग्रेजी माध्यम की ऐक्सीलैंस गलर्स स्कूल फिर कुछ समय बाद उसके लगते ऐक्सीलैंस गलर्स कालेज बनाकर उनके मार्फत पूरी तरह निशुल्क शिक्षा देने की जो शुरुआत उस समय की थी। उस कोशिश का सार्थक परिणाम यह निकला की शहर की अधीकांश बेटियों के शिक्षित होकर भिन्न भिन्न क्षेत्र मे कीर्तिमान स्थापित करके क्षेत्र का मान व सम्मान कायम किया है।
                  ऐक्सीलैंस गलर्स कालेज के पहले बैच की छात्रा रही वर्तमान मे अध्यापिका नसीम बानो कायमखानी ने कहा कि क्षेत्र मे महिला शिक्षा का तत्तकालीन समय मे चलन ना के बराबर था जब वाहिद सर ने स्कूल कायम किया था। उस समय खासतौर पर मुस्लिम समुदाय तो आवर आल शेक्षणिक तौर पर पिछड़ा होने का दंश से लाल हो चुका है। उस समय अन्य समुदाय की बालिकाओं के साथ साथ मुस्लिम बालिकाओं के लिये शिक्षा वो भी अंग्रेजी माध्यम से निशुल्क पाने का इंतजाम करना बडा कठीन काम था। लेकिन वाहिद सर की जीद के कारण वो सबकुछ सम्भव हो पाया। आज मुस्लिम समुदाय मे बेटो के मुकाबले बेटियों की तादाद अधिक हो चुकी है जो आला तालीम हासिल कर चुकी है एवं कर रही है। जब एक वाहिद सर ने क्षेत्र मे सबकुछ बदलकर रख दिया है तो अब ओर वाहिद पैदा करने की भारत भर मे जरूरत महसूस होने लगी है।
            कुल मिलाकर यह है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर  विभिन्न तरह के आयोजित होने वाले कार्यक्रमों मे वक्ताओं व सहभागियों के मध्य महिला उत्थान पर गम्भीर चर्चा जरूर होनी चाहिए। पर इसके साथ साथ सबको यह प्रण करना होगा कि अब महिला उत्थान के लिये घर घर से वाहिद चोहान पैदा करके महिला दिवस की सार्थकता वास्तव मे आगे सिद्ध की जा सकती है।

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