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आसाम-बंगाल आम चुनावो के साथ राजस्थान के होने वाले चार उपचुनावो के बाद गहलोत सरकार गिराने की फिर कोशिश हो सकती है! - पायलट समर्थक प्रदेश भर मे किसान महापंचायते आयोजित करके अपना जनसमर्थन बढा रहे है।

 
                    ।अशफाक कायमखानी।
जयपुर।

                   हालांकि जुलाई-20 मे राजस्थान सरकार गिराने की कोशिश असफल होने के बाद अब पांडूचेरी की कांग्रेस सरकार गिरने के बाद एक दफा फिर चर्चा चल पड़ी है कि राजस्थान के होने वाले चार उपचुनावों के बाद राजस्थान की सरकार गिराने की एक बार फिर कोशिश हो सकती है। जुलाई-20 के घटनाक्रम से सबक लेकर मुख्यमंत्री गहलोत को अपनी कार्यशैली मे बदलाव लाकर पार्टी विधायकों मे जारी असंतोष को दूर करने के लिये कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन गहलोत ने इसके विपरीत जाकर सचिन पायलट समर्थक विधायकों को कुचलने व राजनीतिक तौर पर उन्हें किनारे लगाने मे ही अब तक पुरी ताकत लगाते रहने से ही फुर्सत नही मिल पाने से हालात जस के तस कायम है।
                  जुलाई माह मे घटे राजनीतिक घटनाक्रम के चलते प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सचिन पायलट को हटाकर अब तक प्रदेश के इतिहास मे बने सभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षो मे से सबसे कमजोर अध्यक्ष डोटासरा को बनाने मे गहलोत निश्चित सफल रहे। लेकिन गहलोत को यह नही भूलना चाहिए कि उन्होंने इससे पहले भी जाट के नाम पर चंद्रभान को अध्यक्ष बनाया था जिसके अध्यक्ष पद पर रहते कांग्रेस की टिकट पर मण्डावा से विधानसभा चुनाव लड़ने पर जनता ने उनकी जमानत जब्त करके उन्हें बेरंग लोटाकर गहलोत के फैसले को बदलकर उन्हें भविष्य के प्रति आगाह किया था। लेकिन एक दफा फिर गहलोत ने डोटासरा के रुप मे चंद्रभान की तरह अपने उस फैसले की पुनरावृति की है।
                तिकड़म व दिल्ली हाईकमान को सेट करके गहलोत चाहे मुख्यमंत्री बनने व बने रहने मे कामयाब नजर आ रहे है। जबकि असल मे जनता मे उनके आकर्षण मे भारी कमी आना साफ नजर आ रहा है। पहले कर्नाटक फिर मध्यप्रदेश व अब पांडूचेरी की कांग्रेस सरकार गिर चुकी है। अब राजस्थान सरकार गिराने की एक दफा फिर से कोशिश हो सकती है। राजस्थान भाजपा के दो खेमे मे बंटे रहने व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समर्थकों के उतावले पन का गहलोत को फायदा जरूर मिल रहा है। लेकिन ज्योही भाजपा के अंदरूनी झगड़े पर मोदी-अमीत शाह जिस दिन कंट्रोल कर लेगे उसी दिन से राजस्थान की राजनीति मे भूचाल आने लगेगा।
              वर्तमान समय मे कांग्रेस के नीसान पर जीते कुल 101 विधायको मे से भंवरलाल, कैलाश त्रिवेदी व गजेन्द्र शक्तावत नामक तीन विधायको का निधन हो चुका है। वही एक लोकदल विधायक कांग्रेस के साथ है। छ विधायक बसपा से कांग्रेस मे आये है। तेराह निर्दलीय विधायकों मे से दस विधायक खुले तौर पर गहलोत के पक्ष मे खड़े नजर आते है। जबकि भाजपा के साथी रही तीन रालोपा विधायकों का अब साथ छूटने के बाद भाजपा के 73 विधायकों मे से एक विधायक के निधन के कारण कुल 72 विधायक वर्तमान समय मे है। दो माकपा व दो बीटीपी के विधायक है। सांसद हनुमान बेनीवाल के एनडीए छोड़ने से भाजपा समर्थक विधायको मे तीन की कमी व बीटीपी के कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लेने से गहलोत सरकार समर्थक विधायकों की तादाद मे दो की कमी आई है। जुलाई माह मे घटे राजनीतिक घटनाक्रम के समय  गहलोत के साथ मजबूती से खड़े रहे समर्थक विधायकों के मनोबल व संख्या मे वर्तमान समय मे कमी आना देखा जा रहा है। उपचुनावों मे गुजर- किसान व मुस्लिम मतदाताओं का गहलोत से खासतौर पर मोहभंग होते चले जाने से कांग्रेस को झटका लग सकता है। उपचुनावों मे कांग्रेस अपनी पुरानी तीनो सीट बचाने मे कामयाब नही रही तो गहलोत पर मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक दवाब बढेगा। उस स्थिति मे उनपर अनेक राजनेता उनके नेतृत्व को लेकर हमलावर होगे।
                    कुल मिलाकर यह है कि प्रदेश मे होने वाले चार उपचुनावों के बाद मुख्यमंत्री गहलोत के नेतृत्व को लेकर पहले कांग्रेस पार्टी मे विरोध के स्वर मुखर हो सकते है। वही अलग से कर्नाटक-मध्यप्रदेश व पांडूचेरी की तरह राजस्थान की कांग्रेस सरकार को गिराकर अन्य सरकार बनाने के प्रयासो मे तेजी आने की सम्भावना जताई जा रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय 2003 व 2013 के हुये आम विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस के पक्ष मे आये परिणाम को एक नजीर के तौर पर अनेक नेता 2023 के होने वाले आम विधानसभा  चुनाव मे परिणाम आने की सम्भावना जताकर एक वर्ग नेतृत्व परिवर्तन की मांग को भी मजबूती के लिये उपचुनाव के बाद ताकत दे सकता है।

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