संस्मरण: डा. लोहिया के सिद्धान्तों ने बनाया समाजवादी


बात 1967 की है, जब डा. राममनोहर लोहिया उत्तर प्रदेश में चुनावी दौरा कर रहे थे। उस दौरान वह लगभग दो घण्टे विलम्ब से जनपद बाराबंकी में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे। इस सभा के बाद वह सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता सरदार जगजीत सिंह के घर पर भोजन के लिए गए। उस समय तक वह बाराबंकी सदर के उम्मीदवार को ना तो जानते थे और ना ही पहचानते थे। उन्होने मु़झसे पूछा कि ’राजनाथ! यहां का उम्मीदवार कौन है?‘ मैेने उन्हे तपाक से जवाब दिया कि ’अनंतराम जायसवाल जी।‘ इसके बाद मैने डा. लोहिया से अनंतराम जायसवाल का परिचय कराया। उन्होनें मुझसे पूछा कि ’मेरे विलम्ब होने के दौरान भाषण कौन दे रहा था?‘ तो अनंतराम जायसवाल जी ने कहा कि ’मै‘। उन्होने पूछा कि ’तुम कितनी देर बोले?‘ तो उन्होने कहा कि ’लगभग दो घण्टे।‘ तब डा. साहब ने कहा कि तुम चुनाव जीत जाओगे और वही हुआ। अनंतराम जी चुनाव जीत गए। इसी दौरान वहां मौजूद पार्टी के कुछ लोगो ने डा. साहब को बताया कि राजनाथ को पार्टी ने हैदरगढ़ से टिकट देने का निर्णय लिया था। लेकिन राजनाथ ने अपने मित्र सुन्दर लाल दीक्षित जोकि वहां से चुनाव लड़ रहे थे इसलिए चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया। डा. लोहिया उन लोगों से बोले कि ’राजनाथ ने अपने मित्र धर्म का निर्वाहन किया है इसलिए आप चिंता न करें मैं इनको सारे देश का नेता बना दूंगा।‘ लेकिन वह मन से बेहद दुःखी थे कि मैने यह अवसर छोड़ा क्यों? 


उन्हें चुनाव प्रचार के अगले पड़ाव में बाराबंकी से बस्ती जाना था। स्टेशन पर गाड़ी लगभग एक घण्टे से अधिक लेट थी। डा. लोहिया को स्टेशन छोड़ने मैं और रामसेवक यादव के छोटे भाई श्याम सिंह यादव गए थे। गाड़ी लेट होने की वजह से वह ट्रेन की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर टहलने लगे। उसी समय उन्होने मुझसे होल्डाल को खोलकर जूता निकालने को कहा। चूंकि मैनें पूर्व में इस कार्य को कभी नहीं किया था। इसलिए मेरा हाथ होल्डाल में उस ओर चला गया जिस ओर तकिया रखी थी। फिर क्या था डा साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनके गुस्से का मुख्य कारण मेरा हैदरगढ से चुनाव न लडना भी था। लेकिन अंततः उनका गुस्सा कुछ शान्त हुआ और मैने उन्हें जूते पहनने के लिए दिए। इसके बाद मैने उनकी चप्पल को पुनः जूते के स्थान पर होल्डाल में रख दिया। स्थिति सामान्य होने के बाद उन्होने श्याम सिंह से कहा कि ’रामसेवक से कहना कि चुनाव की दौड़ धूप में शक्कर से परहेज रखेंगे।‘ इसी वार्तालाप के दौरान गाड़ी आ गई और डा. साहब बस्ती के लिए रवाना हो गए। 


चुनाव के परिणाम आ चुके थे। उप्र में गैर कांग्रेसी सरकार बन गयी थी। हार के परिणामों की समीक्षा करने के लिए डा. लोहिया पुनः लखनऊ आए। वह लखनऊ मेल से लखनऊ पहुंचे थे। उनके स्वागत के लिए पूरी कैबिनेट और पार्टी नेताओ एक बडा हुजूम स्टेशन के बाहर मौजूद था। लखनऊ चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर उप्र सरकार की कैबिनेट में शामिल मंत्रियों और पार्टी नेताओ की गाडियां कतार में खडी थी। लोग डा. लोहिया का जोरदार स्वागत कर रहे थे। वही पार्टी के कुछ नेता उन्हे अपनी गाडी में बैठाने का प्रयास कर रहे थे। वहीं डा लोहिया का स्वागत करने मैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के मेरे साथी जितेन्द्र अग्निहोत्री उर्फ दददू भी पहुंचे। 


स्वागत और मेल मिलाप के बाद काफी लोग चले जा चुके थे। चूंकि डा लोहिया वैचारिक रूप से सरकारी संसाधनों के उपयोग का विरोध करते थे। इसलिए वह सरकारी वाहन से नही गए। तभी पार्टी के संयुक्त मंत्री एवं राजनारायण के निकटतम सहयोगी रमाशंकर गुप्ता एक तांगे से स्टेशन पर पहुंचे। तांगे पर आगे डा. लोहिया और वही उनके पीछे मैं और दददू बैठे। 


डा. लोहिया उन दिनों कैसरबाग स्थित गोपाल नारायण सक्सेना उर्फ पालन जी के घर पर ही रूका करते थे। हम सभी स्टेशन से सीधे उनके घर पहुंचे। डा लोहिया उप्र सरकार की कैबिनेट में मंत्रियो के नामों से असंतुष्ट थे। उनका मानना था कि राजनारायण और रामसेवक यादव ने मिलकर अपने खास लोगों को मंत्रीमण्डल में मंत्री बना दिया। मंत्रीमण्डल में शामिल न होने से सालिगराम जायसवाल, गोपाल नारायण सक्सेना, वासुदेव सिंह जैसे कई लोग बेहद नाराज थे। उनकी नाराजगी इतनी विकट थी कि वह अपनी प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से कर चुके थे। इसके बाउजूद भी वह गोपाल नारायण सक्सेना उर्फ पालन जी के घर पर पहुंचे। पालन जी भारतीय संविधान सभा के सदस्य थे और डा. साहब के संकटकालीन राजनीति के साथी भी थे। 


घर पहुंचते ही डा. लोहिया ने देखा कि पालन जी लेटे हुए है, चूंकि गोपाल नारायण सक्सेना जी डा साहब से उम्र में बडे़ थे और वह बीमार होने का बहाना बनाकर लेटे ही रहे। डा लोहिया उनके नजदीक जाकर हालचाल लिया। इसके बाद डा. साहब दूसरे कमरे में चले गए। उस दिन पालन जी और उनकी पत्नी के व्यवहार से डा लोहिया मानसिक रूप से क्षुब्ध थे। इसी ऊहापोह की स्थिति के बीच अचानक रामसागर मिश्रा वहां पहुंचे और डा. साहब ने अपने गुस्से का इजहार उनसे किया। उन्होने कहा कि ‘तुमने मेरी आदत खराब कर दी है। मुझे अभी एक समीक्षा बैठक में जाना है और मेरे कपडों का अभी तक कुछ पता नही।’ इतना कहकर डा. साहब नहाने चले गए। इसके बाद वह नहा करके उन्होनें हल्का नाश्ता किया और पालन जी के घर से बाहर आए। 


बाहर आते ही डा. लोहिया ने अपना एक हाथ मेरे और दूसरा हाथ जितेन्द्र अग्निहोत्री उर्फ दददू के कंधे पर रखकर अमीनाबाद स्थित रामकिशन मार्केट की ओर चल दिए। जहां पार्टी की समीक्षा बैठक होनी थी। तभी डा. लोहिया ने देखा कि अमीरूददौला पार्क में करीब-करीब सभी पार्टियों के झण्डे लगे थे लेकिन सोशलिस्ट पार्टी का एक भी झण्डा न होने से वह मेरे और दददू पर बेहद नाराज हुए और कहा कि ’तुम लोग काफी हाउस में बैठ कर चाय पी सकते हो लेकिन पार्टी का झण्डा नही लगा सकते।‘ तब मैने उन्हें अश्वस्त किया कि अगली बार जब आप आएंगे तो लखनऊ की सभी सड़कों पर पार्टी के झण्डे आपको नज़र आएंगे। इसके बाद मैने उनसे पूछा कि ’प्रो. वासुदेव सिंह ने समाचार पत्रों में एक बयान दिया है कि डा. लोहिया शाफ्ट कार्नर है और मैं हार्ड कार्नर हूं।‘ इस पर डा. साहब ने बहुत ही मार्मिक शब्दों में कहा कि ’जब बहुत बुरे दिन थे, तब वासुदेव सिंह जैसे कई अन्य लोग भोजन इत्यादि की व्यवस्था करने और उसे बनाने का काम करते थे। उनका प्रतिरोध करना राजनारायण सरीखे नेताओं के कारण हुआ है।‘ समीक्षा बैठक के बाद डा. साहब पुनः पालन जी के घर पर आए और विश्राम करने के लिए कमरे में चले गए। 


इसी दौरान मेरे साथी एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के तत्कालीन अध्यक्ष एस.पी राना और महामंत्री सरदार बेअन्त सिंह मुझे खोजते वहां आ पहुंचे। उन्होनें मुझसे कहा कि आज लखनऊ विश्वविद्यालय के यूनियन हाल में छात्रों का एक कार्यक्रम रखा है। यदि डा. साहब उसमें शामिल हो जाए तो युवाओं का हौसला बढेगा। मैने उनसे कहा कि विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में डा. साहब शाम 6ः30 से 7ः00 बजे के बीच यूनियन भवन पहुंच जाएंगे। इस चर्चा के बाद वे सभी साथी कार्यक्रम की तैयारी करने के लिए चले गए। 



विश्राम करने के बाद जब डा. लोहिया कमरे से बाहर आए तो मैने उन्हें शाम के कार्यक्रम के बारे में बताया। इतना सुनकर डा. साहब मुझ पर बेहद नाराज हुए और कहा कि ‘मेरा कार्यक्रम देने वाले तुम कौन होते हो?’ मैने उनसे बड़ी विनम्रता से जवाब दिया कि ‘सुबह से ही मैं आपकी सेवा में हूं। क्या कार्यक्रम कोई दूसरा व्यक्ति देगा?’ वह मुस्कराए और कहा कि ‘आज मुझे वापस जाना है और रात का खाना भी छूट जाएगा।’ मैने उनसे कहा कि ‘खाने की समूचित व्यवस्था कर दी है।’ शाम को जब मैं और दद्दू डा. लोहिया को लेकर लखनऊ विश्वविद्यालय के यूनियन भवन पहुंचे तो वहां मौजूद छात्रों और नवजवानों की भीड़ देखकर डा. साहब भावविभोर हो गए। वहां उन्होनें युवाओं को सम्बोधित अपना अभूतपूर्व भाषण दिया। कार्यक्रम के बाद डा. साहब के लिए जो नाश्ते की व्यवस्था हुई। उससे वह और भी ज्यादा प्रफुल्लित हो गए। नाश्ते में उनके लिए सैंडविच, हाफ फ्राई, काफी इत्यादि कई ऐसी चीजें थी जिससे उन्होनें भर पेट भोजन किया। फिर जब हम उन्हे छोड़ने चारबाग रेलवे स्टेशन जा रहे थे तो वह बार-बार यूनियन हाल के कार्यक्रम की तारीफ कर रहे थे। इसी बातचीत के दौरान रेलवे स्टेशन आ गया। लेकिन उनके स्टेशन पहुचते ही उनके चेहरे पर पता नही कैसी निराशा थी। मानो वह किसी को खोज रहे हो। इसी ऊहापोह की स्थिति में ट्रेन आ गयी और वह उसी उधेड़बुन में ट्रेन पर चढ गए। तभी प्लेटफार्म पर दूसरे झोर से दौडते हुए रामसागर मिश्रा जी आ गए और उन्होने डा लोहिया की सदरी में कुछ रखने के लिए हाथ डाला और इसके बाद डा साहब के चेहरे से चिंता दूर दिखाई पड रही थी। डा लोहिया की लखनऊ यह अन्तिम यात्रा थी और उनके साथ बिताया मेरा यह अन्तिम प्रसंग था। इसके बाद वह बीमार पड़ गए और फिर बीमारी की हालत में दिल्ली के बिल्ंिगडन अस्पताल में उन्हे देखने का अवसर मिला। इसके बाद उनकी अन्तिम यात्रा में शामिल हुआ। डा. लोहिया के साथ मेरा आत्मीय लगाव था। उनके क्रियाकलापों और विचारों ने मेरे जीवन पर एक ऐसी छाप छोड़ी जिनसे मैंने समाजवाद को अपने जीवन का आधार बनाया। डा. लोहिया की नीतियां और उनके विचार आज भी प्रसांगिक है।


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