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राजस्थान सरकार मे नेतृत्व की हठधर्मिता व काम के तौर तरीकों को लेकर फिर आवाज उठ सकती है !


जयपुर।
             राजस्थान मे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के काम के तौर तरीकों को लेकर राजस्थान कांग्रेस के कुछ विधायकों द्वारा पहले भी दिल्ली जाकर अपनी बात रखने की कोशिश करने पर ही मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने खास महेश जोशी के मार्फत सचिन पायलट व उनके साथ जाने वाले उन विधायकों के खिलाफ 124-ऐ सहित विभिन्न धाराओं मे शिकायत एसओजी व ऐसीबी मे दर्ज करवा कर एक तरह से पार्टी के अंदर अलग सा माहोल बनाकर सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री पद से व उनके समर्थक दो मंत्रियों को मंत्री मण्डल से हटाने के साथ साथ मतदान के बाद मतो से जीते यूथ कांग्रेस व एनएसयूआई प्रदेश अध्यक्षों के अलावा मनोनीत सेवादल प्रदेश अध्यक्ष को हटाकर अपना पक्ष मुख्यमंत्री ने चाहे मजबूत जरुर कर लिया हो। लेकिन उसके बाद मुख्यमंत्री गहलोत की छवि पर तेजी से विपरीत असर व सचिन पायलट को भारी जनसमर्थन मिलता साफ नजर आ रहा है।
                करीब 34-35 दिन कांग्रेस विधायकों को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा जयपुर व जैसलमेर की होटलो मे बाड़ेबंदी करके रखने के बावजूद आज भी उन सब गठित घटनाक्रमों से गहलोत सबक लेकर पार्टी हित मे कोई सार्थक कदम उठाने के बचाय अपनी कुर्शी को जैसे तैसे बचाये रखने की भरसक कोशिश करने मे लगे है। चाहे उनकी उन कोशिशों से राजस्थान मे पार्टी रसातल पर ही क्यो नही जा रही हो।
           होटलो मे बाड़ेबंदी मे रहने वाले विधायकों ने उस समय मे मुख्यमंत्री से करीब करीब रोजाना आसानी से मिलते हुये अनेक राजनीतिक पदो के अलावा संगठन मे अहम जिम्मेदारी मीलने के सपने संजोए थे। लेकिन बाड़ेबंदी से आजाद हुये विधायकों को दो महीनो होने को आ रहे पर मुख्यमंत्री नियुक्तियों का पीटारा खोलने की बजाय उन पर कुण्डली कसकर मारे बैठे है। जिससे उन उम्मीद लिये विधायकों व उनके समर्थकों मे असंतोष पनपने लगा है। दूसरी तरफ गहलोत सरकार का हर कदम सचिन पायलट समर्थक रहे विधायक भंवरलाल शर्मा को छोड़कर बाकी सभी 18-विधायको को एक तरह से राजनीतिक तौर पर किनारे लगाने की तरफ उठने के बावजूद उन विधायकों की अपने क्षेत्रो मे मकबूलियत का ग्राफ ऊपर जाता दिखाई दे रहा है। अभी सम्पन्न सरपंच चुनाव मे उनके काफी समर्थक सरपंच चुनाव जीत कर आये है। जबकि बाड़ेबंदी मे मोजूद विधायकों मे से अधिकांश विधायकों की पंचायत मे उनके विरोधी चुनाव जीतने के अलावा क्षेत्र मे उनके खास रहे लोगो को सरपंच चुनाव मे मुहं की खानी पड़ी है।
              पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के जन्म दिन पर उनके समर्थकों द्वारा रक्त दान करके विश्व रिकॉर्ड बनाने के बाद अभी मुख्यमंत्री गहलोत के गृह क्षेत्र जोधपुर जाने पर सचिन पायलट के काफिले मे सेंकड़ो गाडियों के शामिल होने अलावा जगह जगह भारी भीड़ द्वारा उनका भव्य स्वागत करने के बाद पायलट को मिलते भारी जनसमर्थन से गहलोत समर्थकों मे बैचेनी पैदा करके रखदी है। इसके अलावा लाख कोशिशों के बाद भी पायलट समर्थक विधायकों की एकजुटता को किसी भी स्तर पर क्रेक नही कर पाने से एक खेमा अभी भी खासा बैचेन नजर आ रहा है। इसके विपरीत होटल की बाड़बंदी मे शामिल रहे अनेक विधायकों का सब्र उन्हें राजनीतिक लाभ मिलने मे देरी होने से जवाब देने लगा है। अगर उन विधायकों को राजनीतिक नियुक्तियों व संगठन मे जल्द एडजस्ट नही किया गया तो उनमे पनपने वाला असंतोष सातवे आसमान पर होगा। सचिन पायलट को हटाकर प्रदेश अध्यक्ष पद पर गोविंद डोटासरा को मनोनीत करवाने मे गहलोत जरूर कामयाब रहे है। पर डमी अध्यक्ष के तोर पर विख्यात हो चुके डोटासरा की अभी तक कार्यकारिणी तक गठित नही होने से अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकने वाली कहावत संगठन स्तर पर राज्य भर मे हो रहे कार्यक्रमों से साबित होती साफ नजर आ रही है। गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार की ताकत विपक्षी दल भाजपा को कमजोर करने के बजाय स्वयं की पार्टी के नेता व विधायकों को कमजोर करने मे अधिक इस्तेमाल होती बता रहे है।
               कुल मिलाकर यह है कि गहलोत व पायलट खेमो को लेकर दिल्ली हाईकमान द्वारा बनाई गई तीन सदस्यीय समिति व प्रदेश महामंत्री पाण्डेय को हटाकर माकन को प्रभारी बनाने के बाद ऊपरी तौर पर नजर आ रही शांति को राजनीतिक समीक्षक तुफान आने के पहले की शांति बता रहे है। इतना सबकुछ होने के बाद गहलोत के मुख्यमंत्री स्तर पर काम करने के तौर तरीकों मे किसी तरह की नरमी व बदलाव ना आकर वो केवल मात्र अपने आपको मुख्यमंत्री पद पर बनाये रखने के लिये सबकुछ करने मे व्यस्त नजर आ रहे है। उनके दो साल के कार्यकाल के बाद से ही अब जनता कहने लगी है कि अगले चुनाव तक गहलोत ही राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते है तो कांग्रेस विधायकों की संख्या एक अंको से ऊपर किसी सूरत मे नही आना सम्भव कतई नही होगा।


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