राजनीति मे अपने मुकाबलाती नेताओं को किनारे लगाने मे मुख्यमंत्री गहलोत कभी चूके नही !


जयपुर।
               पीछले दो-तीन महीने पहले राजस्थान के कांग्रेस विधायकों मे नेतृत्व के काम करने के तरीकों को लेकर मची आपसी कलह को लेकर तत्तकालीन उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट व उनके समर्थक विधायको के खिलाफ एक तरह से बगावती तेवर अपनाने का अजीब सा माहोल बनाने के बाद अशोक गहलोत तत्तकालीन उहापोह के माहोल मे सोची समझी रणनीति के तहत पायलट को दोनो पदो से व उनके समर्थक दो मंत्रियों को मंत्री पद से हटाने मे कामयाब हो जाने के बावजूद कांग्रेस नेता राहुल गांधी व प्रियंका गांधी ने समय रहते प्रकरण की असलियत जानकर सचिन पायलट व उनके समर्थक विधायकों की दिल्ली मे शिकायत व सुझाव सुनकर उन्हें मना लेने से गहलोत के उन नेताओं को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाने के मंसूबे पर एक तरह से पानी फिर गया था। लेकिन उसके बाद राहुल गांधी के खिलाफ 2014 मे अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले व राहुल गांधी को ट्वीटर पर पप्पू लिखने के साथ साथ कांग्रेस नेताओं के बजाय भाजपा नेताओं को फोलो करने वाले कवि कुमार विश्वास की पत्नी मंजू को जस्थान लोकसेवा आयोग की छ साल के लिये सदस्य बना कर मुख्यमंत्री गहलोत ने शायद अपना राजनीतिक हिसाब चुकता करते हुये केन्द्रीय दिग्गज नेताओं को चुनौती दे डाली है।
              मुख्यमंत्री गहलोत कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने के बजाय अपने आपको मुख्यमंत्री बनाने व बनने के बाद पूरे समय बने रहने मे पूरी ताकत लगाने के लिये जाने पहचाने जाते है। इसी रणनीति के तहत काम करने के कारण परशराम मदेरणा के नाम पर चुनाव लड़े जाने के बाद 1998 मे कांग्रेस की 156 सीट आने पर गहलोत मुख्यमंत्री बने। फिर गहलोत के मुख्यमंत्री रहते 2003 मे चुनाव हुये तो कांग्रेस 156 से 56 सीट पर आ ठहरी ओर भाजपा ने सरकार बना ली। फिर 2008 मे कांग्रेस ने सीपी जौशी की अगुवाई मे चुनाव लड़ा तो कांग्रेस ने 96 सीट जीतकर सरकार तो बनाई पर दिल्ली सेटिंग्स के कारण गहलोत फिर मुख्यमंत्री बन गये। पूरे पांच साल गहलोत सरकार का अपने मुकाबलाती नेताओं को राजनीतिक तौर पर किनारे लगाने मात्र का तौर तरीका पहले जैसा ही रहा तो 2013 मे गहलोत के मुख्यमंत्री रहते विधानसभा चुनाव हुये तो कांग्रेस मात्र 21-सीट ही जीत पाई। इसके बाद सचिन पायलट को दिल्ली से हाईकमान ने राजस्थान भेजकर कांग्रेस को फिर से प्रदेश मे मजबूत करने को भेजा। पायलट ने जमकर मेहनत की ओर 2018 के विधानसभा चुनाव मे पायलट के चेहरे के कारण कांग्रेस ने फिर सो सीट जीतकर सत्ता मे वापसी की। कांग्रेस पार्टी की बदकिस्मती ही कहा जायेगा कि इन सबके बावजूद गहलोत फिर मुख्यमंत्री बन गये। राजनीतिक समिक्षको का मानना है कि गहलोत के नेतृत्व मे ही अगर 2023 मे आम विधानसभा चुनाव हुये तो कांग्रेस का दो अंको मे सीट जीतना मुश्किल होगा।
         मुख्यमंत्री गहलोत 1998 मे मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के मजबूत स्तम्भ पं नवल किशोर शर्मा, परशराम मदेरणा, नटवरसिंह, रामसिंह विश्नोई, शीशराम ओला व चोधरी नारायण सिंह, सहित अनेक दमदार व जनमानस पर सीधी पकड़ रखने वाले नेताओं को धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर किनारे लगाने मे सफलता पाई ओर अब सचिन पायलट को किनारे लगाने की भरपूर कोशिश कर रहे है। लेकिन पायलट मामले मे अभी तक उन्हें पूर्ण रुप से सफलता नही मिल पा रही है। गहलोत ने अपने पूत्र वैभव को राजनीति मे स्थापित करने की भरपूर कोशिश की पर वो जब इसमे सफल नही हो पाये तो भाजपा नेता अमितशाह की तरह अपने पुत्र को क्रिकेट ऐसोसिएशन मे खपाने मे कामयाब रहे है।
             कुल मिलाकर यह है कि गहलोत सरकार के कामकाज से जनता मे कोई सकारात्मक उत्साह नजर नही आ रहा है। वही गहलोत द्वारा राजस्थान लोकसेवा आयोग मे मनोनीत सदस्यों को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया नही मिलने के कांग्रेस जन काफी विचलित नजर आ रहे है। राहुल गांधी को पप्पू कहने वाले कुमार विश्वास की पत्नी मंजू को सदस्य बनाना राहुल गांधी को सीधी चुनोती देना माना जा रहा है। कुछ लोग तो गहलोत के काम करने के तौर तरीकों को भांपकर कहले लगे है कि प्रदेश मे गहलोत कांग्रेस के अब अंतिम मुख्यमंत्री कहलवा सकते है।


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