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मुख्यमंत्री गहलोत व प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा मिलकर कांग्रेस को खोखला करने पर उतारु!


जयपुर।
            अशोक गहलोत को राजस्थान की कांग्रेस सरकार का मुख्यमंत्री बने दो साल व गोविंद डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने कल बूधवार को सो दिन पुरा होने के बावजूद ना तो गहलोत अभी तक पुरे सदस्यों वाला पूर्ण मंत्रिमण्डल का गठन कर पाये है ओर उसी तरह गोविंद डोटासरा के अध्यक्ष बनने के बाद से लेकर अब तक प्रदेश, जिला व ब्लॉक स्तर के सभी कार्यकारिणी भंग करने के अलावा अग्रिम संगठनो के भी केवल मात्र प्रदेश अध्यक्षो केनये तौर पर मनोनयन के अलावा कलम आगे नही सरकने से लगता है कि मुख्यमंत्री व डोटासरा की मिलीभगत से जारी रणनीति अगर इसी तरह आगे ओर चली तो माने प्रदेश मे कांग्रेस खोखला होकर रह जायेगी है। इस समय दोनो नेताओं द्वारा बोये जा रहे राजनीतिक बीजो की फसल तीन साल बाद होने वाले आम विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस को नुकसान वाली मात्र 21-सीट वाली फसल पहले की तरह काटने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
            गहलोत के 17 दिसम्बर 2018 को मुख्यमंत्री का पद सम्भाले के बाद आजतक पूर्ण मंत्रीमंडल का गठन नही किया है। सत्ता को अपने इर्द गिर्द बनाये रखने के लिये कांग्रेस सरकार बनाने मे अहम किरदार अदा करने वाले कांग्रेस जनो को राजनीतिक नियुक्तियों से लगातार दूर रखते आना का मुख्यमंत्री गहलोत का असल मकसद बन चुका लगता है। दो साल मे राजस्थान लोकसेवा आयोग के चार सदस्यों का मनोनयन किया है जिनके मनोनयन पर भी चारो तरफ से गहलोत पर ऊंगली उठने लगी है। सत्ता का केंद्र केवल मात्र अपने आपको बनाये रखने की गहलोत की रणनीति से कांग्रेस को पहले भी उनके मुख्यमंत्री रहते हुये विधानसभा चुनाव मे काफी नुकसान उठाना पड़ा है एवं इसी तरह आगे भी चला तो फिर पहले की तरह कांग्रेस धीरे धीरे खोखली होकर प्रदेश मे बडा राजनीतिक नुकसान उठा सकती है।
           राजस्थान के तत्तकालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को 14-जुलाई 2020 को अचानक पद से हटाकर सालो के प्रयास के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक तरह से रबर स्टाम्प की तरह गोविंद डोटासरा को अध्यक्ष घोषित करवाने मे कामयाबी मिलने के तूरंत बाद ब्लॉक, जिला व प्रदेश कार्यकारिणी को भंग करके संगठन को लकवा मारने जैसी आत्मघाती कदम उठाया। उस लकवा मारने के कदम को कल बूधवार को सो दिन पुरे होने के बावजूद नीचे से ऊपर तक  के राजस्थान कांग्रेस संगठन मे मात्र केवल एक प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा ही पदस्थापित है। बाकी सभी पद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक उडाते हुये खाली चल रहे है। जो एक सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के लिये इससे बूरी बात क्या हो सकती है कि उनको पुरे प्रदेश मे एक पदाधिकारी के अतिरिक्त अन्य कोई पदाधिकारी बनाने तक के लिये सक्षम मानव नही मिला।
                  कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सत्ता मे आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं व नेताओं को शामिल नही करने की रणनीति के तहत अपने दो साल का कार्यकाल पुरा करने के बावजूद राजनीतिक नियुक्तियों का सीलसीला शुरू करते नजर नही आ रहे है। उसी तरह कल बुधवार को प्रदेश अध्यक्ष के रुप मे डोटासरा पुरे सो दिन कर चुके है। अभी तक कांग्रेस संगठन मे डोटासरा के अलावा एक भी अन्य किसी की भी पदाधिकारी के रुप मे नीचें से ऊपर तक के मनोनयन नही होना सवासो साल पुरानी व प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस के इतिहास मे काला पन्ना लिखा जाना जैसा माना जायेगा। अगर यही हालात प्रदेश मे थोड़े दिन ओर चले तो इससे प्रदेश मे कांग्रेस की जड़े काफी खोखली होने की सम्भावना बनती नजर आयेंगी।


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