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भारत मे ओबीसी-दलित व मुस्लिम राजनीति फिर नये सिरे से परवान चढ कर किसान-मजदूर व पीडित की आवाज मजबूती से उठ सकती है।


जयपुर।
              भारतीय राजनीति पर वैसे तो हमेशा से ही एक खास सोच वाले लोगो का वर्चस्व रहा है। लेकिन फिर भी 20-25 साल पहले तक किसान-मजदूर व पीडित तबको की चाहे दिखावे के तौर पर ही सही पर कुछ ना कुछ हद तक भारतीय राजनीति मे उनकी हिस्सेदारी रहने से किसान-मजदूर व शदियों से सताये पीडित लोगो के साथ साथ अल्पसंख्यकों के हक की बात पर भी राजनीतिक चर्चा हो जाया करती थी। लेकिन अब तो राजनीति मे उक्त तबके को छोड़कर अडानी-अम्बानी जैसे सेंकड़ो पूजीपतियों के हित मे कदम उठाने की मात्र चर्चाएं होने लगी है।
             खासतोर पर हिन्दी भाषी भारत मे चौधरी चरणसिंह, चोधरी देवीलाल , कर्पूरी ठाकुर जैसे एक दर्जन के करीब तत्तकालीन समय के नेता ऐसे थे जो किसी भी रुप मे उक्त तबके की आवाज को बूलंद करने से पीछे नही हठते थे। उनके बाद लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, जोर्ज फरनाडीज, चोधरी अजीत सिंह, शरद यादव , ओम प्रकाश चोटाला, मायावती, नीतीश कुमार व राम विलास पासवान जैसे नेताओं का राजनीति मे उदय तो हुवा लेकिन वो अपने सिद्धांतों पर अधिक समय तक अडिग नही रह पाये। वो सत्ता के लालच मे कुछ समय बाद ही एक सोच वाली ताकतो के चंगुल मे धीरे धीरे फंसकर ऐसे जकड़े की आखिर कार वो राजनीति के स्तम्भ नही बन पाये। अब जाकर तो हालात यह बन गये है कि गरीब, मजदूर व किसान जैसे अन्य कमजोर तबके की सरकारी पोलीसी बनाते समय जीक्र तक नही होता है। उनके नाम का इस्तेमाल केवल मात्र चुनाव के समय चुनावी भाषाओं मे होता है। उसके बाद फिर अगले चुनावों के समय ही उनका नाम फिर सुनाई देगा।
           हालांकि उक्त नेताओं मे से चोटाला व लालू यादव इस समय जैल मे है एवं शरद यादव गम्भीर बीमार की हालत मे गहन चिकित्सा इकाई मे भर्ती है। मुलायम सिंह यादव एक तरह से रिटायर हो चुके है। नीतीश बिहार मे बूरी तरह चुनाव हार रहे है। मायावती इधर उधर राजनीतिक रणनीति बदलने मे लगी रहती है। बाकी लोगो की केवल अब यादास्त बची है।
           उपरोक्त नेताओं की विरासत को बचाकर कठिन राह पर चलकर किसान, गरीब, मजदूर व पीडित की आवाज उठाने के लिये अखिलेश यादव, तेजस्वी, जयंत चोधरी, चंद्रशेखर रावण व कन्हैया कुमार जैसे कुछ अन्य  युवाओं की राजनीति मे जमने की कोशिशें जारी है। लेकिन हर राजनीतिक दल का मनुवादी राजनीतिक नेतृत्व लगातार पहले उक्त उभरते नेताओं पर उपहारों का जाल फेंक कर इनको सत्ता के नशे मे मदहोश करने की चेष्टा करता है। अगर यह उस जाल मे फंसने से बच निकलते है तो फिर वो ताकते इनको स्केण्डल मे फंसाकर बदनाम करने की कोशिशें करने से भी पीछे नही हटते है। इन उभरते नेताओं को राजनीतिक तौर पर किनारे लगाने के लिये प्रमुख राजनीतिक दलो के रणनीतिकार कम से कम इस मुद्दे पर एक राय होते नजर आते है। फिर भी आज के विपरीत राजनीतिक हालातो के बावजूद कन्हैया कुमार, तेजस्वी, जयंत चोधरी, अखिलेश यादव, चंद्रशेखर रावण जैसे कुछ युवाओं पर किसान-मजदूर-पीडित व सदियों से सताये हुये तबके के हक की आवाज उठाने पर खरा उतरने का भरोसा करना ही होगा


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