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राजस्थान सरकार के अस्तित्व पर मंडराया संकट अभी टला नही है। - अगले दो-तीन दिन सरकार के भविष्य के लिये अहम माने जा रहे है।

 

जयपुर।
            मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा सरकारी स्तर पर पीछले डेढ साल के अपने कार्यकाल मे एक तरफा निर्णय लेकर पार्टी के अंदर विरोधी माने जाने वाले नेताओं को राजनीतिक तौर पर नष्ट करने की चाल चलने के चलते उनके व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के मध्य सरकार बनने के साथ ही जो कोल्ड वार शुरु हुवा था। वो वार अब जाकर निर्णायक स्थिति मे पहुंच गया है।
            ईडी-आयकर विभाग व सीबीआई जैसी विभिन्न तरह की सरकारी ऐजेन्सीयो का दुरुपयोग करने का भाजपा की केंद्र सरकार पर आरोप लगाने वाली कांग्रेस पार्टी की राजस्थान सरकार के मुखीया अशोक गहलोत पर भी अपने विरोधियों के ठिकाने लगाने के लिये ऐसीबी व एसओजी का दुरुपयोग करने के आरोप लगने व ऐसीबी व एसओजी विभागों द्वारा मामला दर्ज करके उपमुख्यमंत्री पायलट सहित कुछ नेताओं को पूछताछ करने के नोटिस मिलने के बाद अचानक सरकार को लेकर राजनीतिक हालात बिगड़ना माना जा रहा है।
                 उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बगावती तैवर दिखाने के बाद गहलोत खेमे मे अचानक हलचल बढने के बाद गहलोत के नजदीकी माने जाने वाले राजस्थान से हाल ही मे राज्य सभा सदस्य बने केसी वेणुगोपाल व प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे के सक्रिय होने से विधायक दल की बैठक आज मुख्यमंत्री निवास पर दिल्ली से सोनिया गांघी के कहने पर आये प्रभारी महामंत्री पाण्डे, रणदीप सूरजेवाला व अजय माखन की उपस्थिति मे आयोजित हुई। जिस बैठक के लिये जारी विहिप के बावजूद बीस के करीब कांग्रेस विधायक बैठक मे शामिल नही हुये है। जबकि मुख्यमंत्री निवास पर विधायकों की हुई बैठक मे गहलोत समर्थक नेता 102 विधायक शामिल होने का दावा कर रहे है। जिन 102 मे दस निर्दलीय, एक लोकदल, दो बीटीपी व एक माकपा विधायक के अलावा बसपा से कांग्रेस मे आये छ विधायक भी शामिल होना बताया जा रहा है। इसके विपरीत राजनीतिक सुत्र बताते है कि बैठक मे मुख्यमंत्री गहलोत सहित कुल 99 विधायक बैठक मे शामिल थे।
             मुख्यमंत्री निवास पर आज हुई विधायक दल की बैठक मे करीब 12-विधायक ऐसे भी आये जो किसी भी समय पायलट के एक आदेश पर मुख्यमंत्री समर्थकों के केम्प छोड़कर पायलट खेमे मे जा मिलेगे। वो विधायक केवल हालात का जायजा लेने व उपरी तौर पर मुख्यमंत्री के साथ होना दिखाने आये थे। हां यह जरुर है कि पायलट समर्थक विधायक मुख्यमंत्री गहलोत की कार्यशैली से तो सख्त नाराज व उपमुख्यमंत्री पायलट को अपना नेता मानते है। लेकिन वो विधायक पायलट के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा मे जाने को कतई तैयार नही है।
         कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान सरकार को लेकर मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के मध्य छिड़ी वर्चस्व की जंग मे मुख्यमंत्री गहलोत व उपमुख्यमंत्री पायलट खेमे अपने अपने समर्थक विधायको की तादाद को लेकर बढचढकर दावे कर रहे है। असलियत से पर्दा उठना अभी बाकी है। छिड़ी उक्त जंग जितना समय लेगी उयनी ही अधिक उलझने बढेगी। समर्थक विधायको की तादाद का सही फैसला विधानसभा के पटल पर होने वाले मतदान के बाद ही सामने आ पायेगा। पर यह सत्य है कि राजस्थान सरकार के अस्तित्व पर संकट के मंडराये बादल अभी पुरी तरह छंटे नही है।


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