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राजस्थान मे कांग्रेस सरकार अब गिरे या बचे, पर कांग्रेस को काफी नुकसान हो चुका।


जयपुर।
              मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के मध्य अपने आपको सुपर पावर बनाने के लिये पीछले ढेड साल से चल रहे कोल्ड वार के तहत तीन दिन मे घटे घटनाक्रम के बाद यह तय हो चुका है कि अब सरकार गिरे या बचे लेकिन घटे घटनाक्रम से कांग्रेस पार्टी को काफी नुकसान हो चुका है। साधारण कार्यकर्ता जो बूथ पर खड़ा होकर मतदान करवाने के साथ साथ घर घर जाकर मतदाताओं को कांग्रेस की तरफ अपने तर्को की ताकत के बल पर आकर्षित करता है। वो कार्यकर्ता उक्त नेताओं के आपसी झगड़े से अपने आपको ठगा हुवा महसूस करने के कारण काफी मायूस व उदासीन होता नजर आ रहा है।
            मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपना राजनीतिक कद ऊंचा बनाये रखने के लिये मुकाबील आने वाले नेता का कद हमेशा छोटा करने की भरपूर कोशिश करते रहे है। हमेशा की तरह इस बार भी गहलोत ने प्रभारी महामंत्री अविनाश पाण्डे से मिलकर सचिन पायलट का राजनीतिक कद छोटा करने की शूरुआत से लेकर आखिर तक भरपूर कोशिश करते रहने के बावजूद जब उनका कद छोटा नही हो पा रहा था। तब जाकर विभिन्न ऐजेन्सियों के मार्फत कुछ विधायकों द्वारा आपसी बातचीत के ब्योरे पर एसओजी व ऐसीबी मे विधायक महेश जौशी के मार्फत शिकायत दिलवाने के बाद मुकदमा दर्ज होने पर सचिन पायलट सहित कुछ अन्य नेताओं को संदिग्ध बता कर उन्हें उसमे खसीटने की कोशिश करने  के बाद आखिरकार पायलट व उनके साथी मंत्रियों को बरखास्त तो करवा दिया लेकिन उक्त हरकत का परिणाम आगे चलकर कांग्रेस का प्रदेश से सफाया होने का रास्ता तय कर दिया है। गहलोत ने हमेशा राजनीति मे अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये प्रत्येक अवसर का अपने हित मे उपयोग किया है। गहलोत के मुख्यमंत्री रहते राजस्थान मे जब जब विधानसभा चुनाव हुये उन सभी आम विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस ओंधे मुहं गिरी है।



              अशोक गहलोत व सचिन पायलट के मध्य चले शह व मात के खेल मे रोज घटते घटनाक्रमों के बाद चाहे उक्त दोनो नेता अपनी अपनी जीत मान रहे हो। लेकिन दोनो के झगड़े से राजस्थान मे कांग्रेस को भारी नुकसान हो चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी चलाने के लिये कम से कम प्रदेशो मे उस पार्टी की सरकार होना आवश्यक है। पंजाब मे कांग्रेस की कम मुख्यमंत्री केप्टेन अमरींद्र सिहं की सरकार होना अधिक माना जाता है। कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिये उसकी मदद करने के लिये ले देख मात्र राजस्थान की सरकार बचती है। जिसकी संगठन चलाने के लिये महत्वपूर्ण भूमिका बनती है। वर्तमान घटे घटनाक्रमों के बाद यह तय हो चुका है कि गहलोत बहुमत सिद्ध करे या पायलट की वापसी हो जाये। घटे घटनाक्रम से कांग्रेस विधायकों व नेताओं मे अविश्वास इतना बढ चुका है कि उनका लम्बे समय तक एक रहना मुश्किल है। फिर उनके सामने भाजपा जैसी पार्टी है जो सरकार गिराने के लिये किसी भी स्तर तक जा सकती है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अबतक के अपने कार्यकाल मे पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा नेता वसुंधरा राजे का विशेष ख्याल रखा। राजे के तीन मतो की बल पर पुत्र को राजस्थान क्रिकेट ऐसोसिएशन का अध्यक्ष बनवाया लिया है एवं राजे के सरकारी आवास खाली करने के हाईकोर्ट आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक गहलोत सरकार गई। इसके विपरीत उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के खिलाफ सरकारी स्तर पर जितने षडयंत्र किये जा सकते है उतने षड्यंत्र किये जाते रहे बताते है।
                कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान सरकार के मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के मध्य सरकार को लेकर अपने अपने समर्थक विधायकों की बाड़ेबंदी करने एवं गहलोत-पाण्डे की जोड़ी के दवाब के बाद सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री व अध्यक्ष पद से बरखास्त करने के अलावा दो अन्य मंत्री रमेश मीणा व विश्वेंद्र सिहं को मंत्री पद से बरखास्त करवाने के बाद मसला अधिक पेचीदा हो चुका है। इसकै अतिरिक्त पायलट समर्थक विधायकों के घर नोटिस चस्पा होने के बाद विवाद ओर अधिक गहराता दिखाई दे रहा है। चाहे आगे चलकर कुछ भी समझोता या विभाजन हो। लेकिन यह तय है कि उक्त घटे घटनाक्रमों से कांग्रेस को राजस्थान मे काफी नुकसान हो चुका है।


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