राजस्थान मे चल रहे ताजा राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य ऐजेन्सी एसओजी-ऐसीबी के बाद अब केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री हो सकती है।
जयपुर।

              राजस्थान कांग्रेस विधायक दल के गहलोत-पायलट मे विभाजित हो चुके कांग्रेस विधायकों के बाद मचे राजनीतिक घमासान मे राज्य ऐजेन्सी ऐसीबी व एसओजी मे दर्ज शिकायतो के बाद उक्त दोनो ऐजेन्सी की इन्ट्री के बाद भाजपा प्रवक्ता ने दिल्ली मे प्रैस कांफ्रेंस करके गहलोत सरकार पर फोन टेपिंग करने का आरोप लगाते हुये पुरे मामलो की केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई से जांच कराने की मांग करने के बाद जनता मे जहन मे सवाल उठने लगा है कि राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य जांच ऐजेन्सीज के बाद क्या अब केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री होगी? इसके विपरीत इसी राजनीतिक घटनाक्रम के मध्य आयकर विभाग ने दो कांग्रेस नेताओं के अनेक ठिकानो पर रेड कर चुका हैँ।

          केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई से स्टेट के किसी मामले मे जांच कराना स्टेट की मर्जी पर निर्भर करता है। लेकिन किसी मुद्दे पर न्यायालय अगर आदेश जारी कर देता है तो उस आदेश की पालना मे केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी से जाचं की जा सकती बताते है।

             राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 109 विधायको के समर्थन होने के दावे को सीरीयस नही लिया जा सकता। भाजपा के 72 व रालोपा के 3 विधायको के साथ आरोपितो 3 निर्दलीय विधायको को मिलाकर कुल 78 विधायक बनते है। स्पीकर की तरफ से नोटिस मिलने वालो 19 कांग्रेस विधायकों को मिलाकर कुल 97 विधायक तो यही बन जाते है। एक विधायक भंवरलाल मेघवाल अस्पताल मे भर्ती  होने पर कुल 98 विधायक तो यही हो जाते है। बचे 102 विधायक। उनमे माकपा का एक विधायक बलवान पूनीया गहलोत खेमे को समर्थन देने का ऐहलान कर चुके है। वही दूसरे माकपा विधायक गिरधारी दहिया अब तक पत्ते ना खोलते हुये अपने आपको अपने क्षेत्र मे होने की कह रहे है। बीटीपी के दो विधायक रामदयाल व राजकुमार कभी तटस्थ तो कभी गहलोत खेमे का साथ देने को कह चुके है। इसके अलावा दस निर्दलीय विधायक अभी तक तो गहलोत खेमे की बाड़ेबंदी मे बताते है। पर बाड़ेबंदी से बाहर आने पर वो किधर रुख कर ले यह कहना मुश्किल है। क्योंकि सदन मे वो चाहे जिधर मतदान करे उनकी सदस्यता जाने का खतरा उनको नही है। पार्टी विधायकों के मतदान करने पर उनकी सदस्यता पर प्रभाव जरूर डालता है। इसके विपरीत चाहे भाजपा उक्त घटनाक्रम को कांग्रेस के दो नेताओं का झगड़ा बताये लेकिन चाहे सामने ना सही पर राजनीति के जानकार किसी ना किसी रुप मे उनकी भूमिका होने की बात मान कर चल रहे है।

           कुल मिलाकर यह है कि राजनीति के जानकार मान कर चल रहे है कि बहुमत मिलने की पुख्ता होने पर मुख्यमंत्री सदन मे बहुमत सिद्ध करने की कोशिश करेगे ताकि उसके खिलाफ मतदान करने वाले कांग्रेस विधायको को अपनी विधानसभा सदस्यता से हाथ धोना पड़े ओर फिर खाली जगह पर उपचुनाव हो सके। वही पायलट खेमा जैसे तैसे करके कांग्रेस से कम से कम 36 विधायक अपने साथ लेकर अलग गूट बनाकर फिर सेफ गेम खेलने की कोशिश मे बताते है। भाजपा यह चाहेगी कि गहलोत सरकार पहले गिर जाये फिर वो सरकार बनाये। अन्यथा एक दफा राष्ट्रपति शासन जरुर लग जाये। ज्यो ज्यो समय गुजरेगा त्यो त्यो गहलोत खेमे की लगाम कमजोर व भाजपा की लगाम मजबूत होती जायेगी। पर अभी घटनाक्रमों मे अनेक बदलाव पल पल आते नजर आना तय है।

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