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 राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे स्वयं फंसते नजर आ रहे है।

 
जयपुर।
                1998 मे दिल्ली हाईकमान से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री का पद पहली दफा पाने वाले अशोक गहलोत ने तब से लेकर अब तक प्रदेश के जनाधार रखने वाले दिग्गज कांग्रेस नेताओं को एक एक करके धीरे धीरे राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाते रहने से कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली जाने के बावजूद 2018 मे फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गहलोत ने अपने पुराने रवैये के मुताबिक सचिन पायलट को राजनीतिक तौर पर ठिकाने लगाने का जो जाल बूना उसमे गहलोत स्वयं व उनके कारण कांग्रेस पार्टी फंसती नजर आ रही है।
             2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव परिणाम के मुताबिक कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंचने पर जनता की भावनाओं के विपरीत दिल्ली मे मोजूद कांग्रेस के कोकस से सांठगांठ करके मुख्यमंत्री पद पाने के बाद हमेशा की तरह ब्यूरोक्रेसी के मार्फत सचिन पायलट व उनके समर्थक मंत्रियों को असरहीन करने की भरपूर गहलोत ने कोशिशे की। लेकिन मुख्यमंत्री की उक्त कोशिशों को पायलट व समर्थक विधायक सब समझते हुये सब्र से काम लेते हुये सरकार को पांच साल तक चलाना चाहते थे। पर गहलोत ने विभिन्न धाराओं के साथ स्वयं के मंत्री व कांग्रेस विधायकों के खिलाफ अंग्रेजी राज के समय के बने काले कालून देश द्रोह कानून की दफा 124-A का उपयोग करते उन्हें आरोपी बनाया तो वो सभी नेता दिल्ली हाईकमान को अपनी भावनाओं से अवगत करवाने जाने पर मुख्यमंत्री ने बीना वजह ऐसा माहोल बनाया कि दिल्ली गये सभी कांग्रेस विधायक बागी हो गये है। यानि उनके खिलाफ माहोल बनाने के लिये अपने समर्थक विधायको की बाड़ेबंदी करके पायलट समर्थकों को पहले जिन नेताओं को साईडलाईन किया उसी तरह उनको भी साईडलाईन करने की कोशिशें की पर गहलोत उस कोशिश मे अभी तक कामयाब नही हो पाये है।
                  मुख्यमंत्री गहलोत अपनी रणनीति के तहत लगातार सचिन पायलट पर भाजपा से मिलकर सरकार गिराने का आरोप लगाकर उनको अलग थलग करने की उम्मीद दिल मे पालकर जनता से सहानुभूति पाने की भरपूर कोशिशे करना जारी रखा हुवा है। वही सचिन पायलट ने अपने आपको अभी तक कांग्रेस मे होना व कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य दल मे नही जाने का लगातार कहना जारी रखने के बावजूद गहलोत ने सचिन पायलट व कुछ मंत्रियों को मंत्रीमंडल से जल्दबाजी मे बरखास्त करने व अध्यक्ष पद से हटाने के बाद सुलह की गुंजाइश को एक तरह से आंशिक रुप से खत्म करने मे सफलता जरूर पा ली है।
               मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा बूने जाल के तहत मुख्यमंत्री आवास व होटल मे कांग्रेस विधायक दल की बैठक बूलाई जिसमे उन 19-विधायकों के शामिल नही होने की शिकायत को लेकर मुख्य सचेतक महेश जौशी विधानसभा स्पीकर के पास गये एवं स्पीकर ने चंद घंटो मे उन्हें नोटिस जारी कर नोटिस की तामिल प्रशासन की मदद से घरो पर चिपका कर करने की कोशिश की। असल मे गहलोत इस बहाने उन 19 कांग्रेस विधायकों की सदस्यता रद्द करवाने चाहते थे लेकिन उनकी मंशा को भांपकर वो 19-विधायक उस नोटिस के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय की शरण मे चले गये जहां उस पर स्टे हो जाने के बाद फायनल जजमेंट तक मामला विचाराधीन है। लेकिन स्पीकर के नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट मे सुनवाई होने के बावजूद स्पीकर सुप्रीम कोर्ट गये जहां सुनवाई हो रही है।
             मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा अपनी सरकार के प्रत्येक कार्यकाल मे सत्ता मे सबकी हिस्सेदारी तय करने की बजाय हमेशा सत्ता को अपने इर्द गिर्द कायम रखा है। बोर्ड-निगम व आयोगो का गठन एवं संवेधानिक पदो पर नियुक्ति या तो की नही। अगर कुछ नियुक्ति व गठन किये तो सरकार के जाते समय अपने कार्यकाल के अंतिम दौर मे किये जो सरकार बदलते ही हटा दिये जाते रहे है। गहलोत की उक्त कार्यशैली के कारण भी आम कार्यकर्ताओं मे उदासीनता व असंतोष का आलम छाता रहा है।
            जब गहलोत का फेंका हर पाशा पहली दफा उनके उलटा पड़ने लगा तो उन्होंने हड़बड़ी मे कुछ ऐसे कदम उठा लिये जो अब तक बनाई गई उनकी कथित छवि के विपरीत व असल रुप के अनुसार पाई गई। मुख्यमंत्री गहलोत के अपनी सरकार चलाने की बजाय विधायकों को होटल मे बाड़ेबंदी मे रखने के अलावा किसी तरह उन 19-विधायकों की सदस्यता रद्द कराने मे अधिक रुचि होना देखा गया जो अभी तक संभव नही हो पाया है। सड़क से राजभवन तक कोशिश करने के साथ राजभवन की सुरक्षा को लेकर धमकाने वाले ब्यान से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। विधायकों को साथ लेकर राजभवन जाकर वहां धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी करना उनमे बोखलाहट होना दर्शाता है। इससे पहले अपने साथी रहे पायलट को नकारा व निकम्मा तक बताने से तो साफ लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत अब आपा खोते जा रहे है।
            कांग्रेस द्वारा पहले 27-जुलाई को राजभवन पर प्रदर्शन करने का ऐहलान किया। उस ऐहलान के बाद राज्यपाल ने जब डीजीपी यादव व मुख्य सचिव राजीव को राजभवन तलब करके हालात जाने तो कांग्रेस ने भारत के एकमात्र जयपुर स्थित राजभवन पर प्रदर्शन नही करने का कहकर बाड़ेबंदी मे मोजूद विधायकों वाली होटल मे ही विरोध सभा करने का ऐहलान घबराहट मे कर दिया है।
                मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने 2008 के शासन की तरह इस दफा भी बसपा के छ विधायकों को कांग्रेस मे शामिल कर लिये जाने के बाद विलय को विधान विरोधी बताते हुये बसपा व विधायक दिलावर पहले स्पीकर के पास याचिका लेकर गये फिर माननीय न्यायालय मे याचिका लेकर गये है, जहां सुनवाई होनी है। इसके अतिरिक्त बसपा के राष्ट्रीय महामंत्री सतीशचंद्र मिश्रा ने उक्त बसपा के सभी विधायकों को विधानसभा मे कांग्रेस के बहुमत प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के खिलाफ पाबंद किया है। उक्त मामले को लेकर दायर याचिका व मिश्रा द्वारा बसपा विधायकों को व्हीप जारी करके पाबंद करने से कांग्रेस खेमे मे भारी खलबली मचना देखा जा रहा है।
                मुख्यमंत्री गहलोत व कांग्रेस पार्टी बार बार बहुमत होने का दावा करने पर जनता के मध्य सवाल उठने लगने लगे है कि अगर बहुमत है तो वो आराम से सरकार चलाये उन्हें कोन रोक रहा है। लेकिन फिर भी वो कोविड के प्रदेश मे आसमान छुते आंकड़े व रोजाना एक हजार से अधिक पाये जाने वाले कोराना पोजीटिव मरीजों के बावजूद सरकार को होटल मे बंद कर रखा है।जबकि विधायकों का मुश्किल समय मे उनके क्षेत्र की जनता बेसब्री से इंतजार कर रही है।
               कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे गहलोत-पायलट खेमो मे बंटे कांग्रेस विधायकों के बाद जारी आपसी संघर्ष मे गहलोत पहली दफा अपने बूने जाल मे फंसते नजर आ रहे है। sog व acb एवं 124-A का अपने ही लोगो के खिलाफ उपयोग करने के अतिरिक्त अपनी खामियो को छुपाने के लिये सारे इल्जाम भाजपा पर लगा कर सहानुभूति पाने की कोशिश से गहलोत की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ता नजर आ रहा है। अपनी कमजोरी छुपाने के लिये अपने ही साथी को नकारा व निकम्मा बता देने के बाद जनता मे गहलोत को लेकर अलग तरह की बहस छिड़ चुकी है। जिस तरह कांग्रेस हमेशा भाजपा व संघ का डर दिखाकर मुस्लिम समुदाय को वोटबैंक की तरह उपयोग कर उनके हितो पर कठोराघात करती आई है। उसी तरह अशोक गहलोत भी वर्तमान राजनीतिक घटनाटक्रम मे अपनी कमजोरियों पर पर्दा डालकर अपने आपके मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये हर बात का इल्जाम भाजपा पर लगाने से नही छुकते हुये भावनाओं से खेलने की रणनीति अपना रहे है। जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि अगर स्वयं को सर्वेसर्वा बनाये रखने की इच्छा के तरह परिवार के सदस्य को नाहक कुचलनै की कोशिश मे परिवार मे अगर फूट पड़ती है तो जहां तक संभव हो पाता है उतना विरोधी भी लाभ उठाने की भरपूर कोशिश करते ही हमेशा आये है। अभी भी समय है कि गहलोत को अपने मुख्यमंत्री पद को बचाये रखने के लिये अड़यल रुख को त्याग कर कांग्रेस को बचाये रखने के लिये किसी तीसरे नेता को मुख्यमंत्री क्षका पद देकर पार्टी मे एकता व मजबूती बनाये रखने के लिये आगे आना चाहिए।वरना प्रदेश मे कांग्रेस के लिये हालात साजगार साबित नही होंगे।


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