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पं नवल किशोर शर्मा व परशराम मदेरणा परिवार सहित अनेक मजबूत राजनीतिक परिवारों को हाशिये पर धकेलने वाले मुख्यमंत्री गहलोत पर पायलट भारी पड़ रहे है।


जयपुर।
              हालांकि 1998 मे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बनने के बाद से पार्टी मे मोजूद उनके मुकाबले मजबूत लीडर्स को धीरे धीरे एक एक करके राजनीतिक तौर पर हाशिये पर धकेलने मे गहलोत कामयाब होते गये लेकिन मोजुदा कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को हाशिये पर धकेलने की लाख कोशिश करने के बावजूद सचिन पायलट, मुख्यमंत्री अशोक की हर चाल को नाकाम करते हुये उन पर भारी चाहे ना पड़े लेकिन कमजोर भी नही पड़ रहे है।
             1998 मे राजस्थान कांग्रेस का बहुमत आने पर दिल्ली तिकड़म के बल पर अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद गहलोत ने चालाकी व कूटनीति के साथ मिले हर अवसर का उपयोग करते हुये कांग्रेस मे मोजूद मजबूत राजनीतिक परिवारो को एक एक करके हाशिये पर धकेलने का काम सफलतापूर्वक अंजाम दिया। पं नवल किशोर शर्मा के बाद उनके पुत्र ब्रज किशोर शर्मा, परशराम मदेरणा के बाद भंवरी देवी के बहाने उनके पूत्र महिपाल मदेरणा व उसी के साथ रामसिंह विश्नोई के पूत्र मलखान सिंह विश्नोई , नाथूराम मिर्धा व रामनिवास मिर्धा परिवार के ज्योति मिर्धा-हरेंद्र मिर्धा व रिछपाल मिर्धा को राजनीतिक हाशिये पर आसानी से धीरे धीरे हाशिये पर ढकेलने मे गहलोत कामयाब हो चुके है। उक्त परिवार से एक दो विधायक जरुर बने है। जो एकदम नये होने के कारण वो किसी भी रुप मे गहलोत के लिये लम्बे समय तक चेलैंज नही हो सकते है।
        मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी राजनीतिक कुटनीति व चालाकी से चाल चलने की कला के बल पर अपने उदय के बाद से कांग्रेस मे मोजूद हर राजस्थानी मजबूत राजनीतिक परिवार को हाशिये पर धकेलते हुये अपने राजनीतिक रास्ते को साफ सुथरा बनाने मे कामयाब रहे। पर अचानक यूपी के सारणपुर निवासी पूर्व केन्द्रीय ग्रह मंत्री राजेश पायलट के पूत्र जो राजनीति मे पावर लेकर पैदा हुये सचिन पायलट के राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनकर आने के बाद से अशोक गहलोत ने उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने के लाख जतन करने के बावजूद हटे नही ब्लकि इसके विपरीत पायलट अध्यक्ष पद के अलावा उपमुख्यमंत्री पद पर भी कायम हो गये।
            विधानसभा व लोकसभा चुनाव मे टिकट बंटवारे के साथ साथ राज्य सभा चुनाव के लिये उम्मीदवार चयन को लेकर मुख्यमंत्री गहलोत के मुकाबले पायलट के बराबर मजबूत स्तम्भ की तरह खड़े होने से मुख्यमंत्री गहलोत असहज महसूस करने लगे थे। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री की दौड़ मे चाहे गहलोत आगे भले निकल गये पर वो पायलट को राजनीतिक तौर पर हाशिये पर धकेलने पर कामयाब नही हो पा रहे है।
           जब भारत के अनेक प्रदेशो मे भाजपा वहा कायम कांग्रेस सरकार को गिराने व कांग्रेस विधायकों से पाला बदलवाने व त्याग पत्र दिलवाले मे कामयाब होती जाने लगी तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उक्त अवसर का उपयोग सचिन पायलट को राजनीतिक हाशिये पर धकेलने मे करने के विकल्प तलासने मे करने लगे। मुख्यमंत्री गहलोत को उपमुख्यमंत्री पायलट को घेरने के लिये ढेड साल के कार्यकाल मे पहली दफा राज्यसभा चुनाव के बहाने मिला। मतदान के पहले इनडायरेक्ट रुप से खरीद फरोख्त के बहाने विधायकों की बाड़बंदी करके पायलट को निशाने पर लेने की कोशिश के बावजूद पायलट साफ बचकर निकल गये। इसके बाद भाजपा द्वारा विधायकों की खरीद फरोख्त करके सरकार गिराने की कोशिश पर SOG व ACB मे दर्ज महेश जोशी की शिकायत पर कार्यवाही करने पर 11-जुलाई को मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा प्रैस कांफ्रेंस करके भाजपा नेताओं पर अनेक आरोप लगाते हुये फिर से पायलट को इनडायरेक्ट घेरने की कोशिश की है।
            मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की 11-जुलाई की प्रैस कांफ्रेंस के बाद उनकी सरकार को समर्थन दे रहे तेराह निर्दलीय विधायको मे से ACB की प्राथमिकी मे दर्ज तीन निर्दलीय विधायक सुरेश टाक, सुखवीर, व ओम प्रकाश हुड़ला को कांग्रेस समर्थक विधायकों की सूची से हटा दिया गया है। जबकि मीडिया मे भांति भांति की खबरे चलने के बाद कांग्रेस विधायकों मे भी अविश्वास का माहोल बन गया है। देर रात तक सीएमआर से विधायकों को फोन करके उनकी लोकेसन जानी जा रही थी। वहीं कुछ विधायक व मंत्री मुख्यमंत्री से मिलकर विश्वास भी जताते नजर आये बताते।
        कुलमिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रैस कांफ़्रेंस करने के बाद भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनीया व भाजपा नेताओं ने भी प्रैस कांफ्रेंस करके गहलोत के आरोपो का जवाब दिया है। वही रालोपा नेता सांसद हनुमान बेनीवाल ने इसे अशोक गहलोत व वसुंधरा राजे द्वारा लिखित स्क्रिप्ट बताया है। लेकिन दिन भर घटे घटनाक्रम के बावजूद उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की चुप्पी होने को सबको असमंजस मे डाल रखा है। लगता है कि मुख्यमंत्री गहलोत का पायलट को राजनीतिक रुप से हाशिये पर धकेलने का लगाया ताजा दाव भी खाली जायेगा।


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