मुख्यमंत्री गहलोत को प्रदेश स्तरीय राजनीतिक व सवैधानिक पदो पर मनोनयन का सिलसिला शूरु करने पर विचार करना चाहिए।


जयपुर।
              राजस्थान के गुज्जर नेता कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला ने एक दफा कहा था कि अशोक गहलोत कुछ देते तो है, लेकिन जब देते है तब तक वो बासी हो जाती है। यह कथन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अलावा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भी स्टीक साबित हो चुका है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते राजनीतिक नियुक्ति व संवेधानिक पदो पर मनोनयन करना बार बार टालते रहे ओर अंत मे उनकी सरकार को भाजपा ने सिंधिया की मदद से सत्ता से बाहर करके स्वयं भाजपा ने सरकार बना ली है। कमलनाथ तो राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति कर नही पाये ओर अब मध्यप्रदेश मे भाजपा सरकार धड़ाधड़ नियुक्तिया कर रही है। कमलनाथ की तरह ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रदेश मे कांग्रेस सरकार के ढेड साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद अभी तक राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति करने का सिलसिला शूरु तक नही किया है। जिसके चलते आम कांग्रेस वर्कर को सत्ता मे हिस्सेदारी नही मिलने से वो लगातार धीरे धीरे उदासीन होता जा रहा हैँ।
           गहलोत सरकार वर्तमान संकट मे हो सकता है कि एक दफा सदन मे बहुमत सिद्ध करके उभर जाये। लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात मे बनते बिगड़ते समीकरणों को देखकर सरकार का लम्बा चलना मुश्किल माना जा रहा है। बाड़ेबंदी मे कैद विधायक ज्योही बाहर खुली हवा मे आयेगे त्योही मावव स्वभाव के चलते फिर से सत्ता मे भागीदारी की बात करते हुये गुणा-भाग करने लगेंगे। भागीदारी सभी विधायकों को मिलना मुश्किल होगा। ऐसे हालात मे निराशा के भाव मे आये कांग्रेस व गहलोत सरकार समर्थक विधायकों से फिर अन्य लोग सम्पर्क कर अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर सकते है।उस स्थिति मे धीरे धीरे गहलोत समर्थक विधायकों की संख्या कम होती जायेगी ओर सरकार का रहना मुश्किल होता जायेगा।
          वर्तमान समय मे राजस्थान मे रोजाना बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर दोड़ाये तो अनिश्चितता कायम होना देखा जा रहा है। गहलोत सरकार के बचने व गिरने के अलग अलग कयास लगाये जा रहे है। गहलोत-पायलट खेमे मे बंटा कांग्रेस विधायक दल के मध्य जारी शह व मात के खेल मे अब भाजपा भी कुदती नजर आने लगी है। प्रदेश मे अनिश्चितता की बनी उक्त स्थिति पर राज्यपाल की भी पूरी नजर है। आगे आगे देखना होगा कि प्रदेश की सियासत किस तरफ पलटी खाती है।
          राजनीतिक नियुक्ति व संवैधानिक पदो पर एक प्रक्रिया के तहत मनोनयन मे कमलनाथ व गहलोत एक दुसरे से अधिक फिसड्डी साबित हुये व हो रहे है। लेकिन इसके विपरीत मध्यप्रदेश मे सरकार गिरने व राजस्थान मे बदले राजनीतिक घटनाक्रमों के मध्य छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के मुखिया भूपेश भगेल ने सरकार मे संसदीय सचिव, राजनीतिक नियुक्तिया व संवैधानिक पदो पर धड़धड़ मनोनयन करके एक अलग तरह का माहोल बना दिया है। जिसके बाद वहां का आम कार्यकर्ता भी सत्ता मे अपनी हिस्सेदारी मानकर उत्साहित होकर पार्टी हित मे सक्रिय हो चला है। अगर प्रदेश की सरकार किसी वजह से गिर भी जाये तो संवेधानिक पदो पर नियुक्त उन लोगो को त्याग पत्र देने की आवश्यकता नही होती। वो अपना कार्यकाल चाहे तो पुरा कर सकते है।
          कुल मिलाकर यह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान की राजनीति मे आये भूचाल के मध्य ही पिछले एक सप्ताह मे संसदीय सचिव, राजनीतिक व संवेधानिक पदो पर नियुक्ति करने की झड़ी लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के रास्ते को अपनाने की बजाय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रास्ते को अपना कर प्रदेश मे खाली चल रही नियुक्तिया जल्द कर देनी चाहिए वरना बाद मे पछतावा हो सकता है जब चिड़िया खेत चूग जाये। अगर ऐसा हुवा तो आम कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें कभी माफ नही करेगा। उस स्थिति मे उदासीन हुवा कार्यकर्ता पार्टी हित मे उतना काम नही कर पायेगा जितना काम 2018 के चुनाव मे वसुंधरा राजे सरकार को हटाने मे किया था।


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