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काश हम पहले सम्भल जाते तो आज यह हालात नही देखने पड़ते।


जयपुर।
               भारत के अन्य हिन्दी भाषी राज्यो के मुकाबले चाहे राजस्थान के मुस्लिम समुदाय की भारतीय राजनीतिक पटल पर खास चर्चा नही होती होगी लेकिन एक समय था जब राजस्थान के मेव-सिंधी मुस्लिम-गद्दी-खेलदार व कायमखानी बिरादरी के लोग मेहनत के बल पर जमीन के सीने को चीर कर उससे खाद्य सामग्री की उपज करके अपने बच्चों व अन्य वतन भाइयो का पेट को भोजन उपलब्ध कराने मे अहम किरदार अदा करते थे। इसके साथ ही उक्त बिरादरियों मे बच्चों को तालीम दिलवाकर फौज व पुलिस की सेवा मे भेजने का सीलसीला भी कायम था। लेकिन आजादी के बाद रफ्ता रफ्ता उक्त बिरादरियों मे खेती करने का चलन कम होता गया ओर खेती की जमीन बेचने का शोक आम होता गया। उक्त जमीन बिकने से जो पैसा आया वो किसी उधोग-धंधे मे लगने के बजाय पारम्परिक रीती रिवाजों मे फिजूल खर्च को बढावा देने मे बरबाद होता गया। जिसके कारण आज वैश्विक महामारी कोराना संकट के लोकडाऊन व विश्वव्यापी मंदी मे मुस्लिम समुदाय के हाथ पुरी तरह खाली होते नजर आये।
                   राजस्थान के मुस्लिम समुदाय को समझने के लिये पाते है कि एक तरफ शहरो मे दस्तकार बिरादरियो का रहना था जो हाथ से अपने खानदानी काम करके अपना गुजारा किया करते थे। दुसरी तरफ वो बिरादरी थी जो देहातो मे रहकर आग बरसाती गर्मी मे खेती-बाड़ी करके जीवनयापन किया करती थी। लेकिन धीरे धीरे बदलाव की बयार यू चली कि उक्त देहाती बिरादरियों मे भी शहरी भौतिक सुविधाओं के प्रति शौक बढा ओर वो इस चक्कर मे अपनी मूल जड़ो से कटने लगे ओर आराम तलब जीवनशैली को अपनाने लगे। अधीकांश देहातियों ने शिक्षा पाने या बच्चों को शिक्षा दिलवाने के लिये शहरो की तरफ रुख करना बताया लेकिन कुछेक को छोड़कर बाकी सभी शिक्षा को ठीक से पाने मे असफल होने के कारण पीछड़ते पीछड़ते रसातल पर पहुंच गये। यानि बद से बदतर हालात मे पहुंचने का सीलसीला चल पड़ा।
                 राजस्थान के अलवर-भरतपुर मे मेव, मारवाड़ मे सिंधी मुस्लिम, सवाईमाधोपुर मे गद्दी-खेलदार व शेखावाटी व मारवाड़ के कुछ भाग मे कायमखानी बिरादरियों का रहना है व रहा है। जिनका पहला जीवनयापन का प्रमुख जरिया खेती व पशुपालन ही हुवा करता था। उक्त बिरादरियों के लिये कहा जाता है कि यह मुश्किल हालात मे अभावो के मध्य रहकर भी जीवन को आगे बढाने के आदी थे। कठोर व गठीला बदन के साथ साथ कद-काठी के ठीक हुवा करते थे जबतक यह देहातो मे रहे है।
               देश बंटवारे के दंश से उभरते उभरते जब 1965-70 का दौर आया तो उक्त देहाती मुस्लिम बिरादरियों मे जदीद तालीम का चलन बढने लगा ही था कि उसी के साथ अन्य प्रदेशों के कुछ कथित लोग यहां आकर धर्म के नाम पर शिक्षा व इबादत के नाम अपना वर्चस्व जमाने के लिये घर घर व परिवार परिवार मे फूट डालना शुरु क्या किया कि जदीद तालीम की रफ्तार को ब्रेक ऐसा लगा कि आज प्रदेश का मुस्लिम समुदाय को दलित व पीछड़ो से भी बदतर स्थिति मे सरकारी रिपोर्ट मे माना जाने लगा है।
            सरकारी खजाने मे समुदाय की हिस्सेदारी ना के बराबर है। अधिकारी व कर्मचारी ऊंगलियों पर गिने जा सकते है। सत्ता सूख से कोसो दूर है। ओर जदीद तालीम की तरफ जो रुझान होना चाहिए था जो रुझान हो नही पाया व हो नही रहा है। आपसी टकराव व मसलको मे उलझकर बीना वजह भटकने की राह पकड़ने को आतूर नजर आ रहे है। उच्च मापदण्ड वाली शिक्षा ना पाने की वजह से सरकारी व गैरसरकारी सेवाओं मे प्रतिनिधित्व खत्म होने के कगार पर है। अरब मे मजदूरी के रास्ते मे अवरोध खड़े हो चुके है। गावो मे बेरोजगारों के झूंण्ड के झूंड घूमते व बैठे नजर आते है। अधीकांश बच्चे पांचवीं-दसवीं के आगे शिक्षा ग्रहण कर नही पा रहे है। युवाओं मे दक्षता की काफी कमी है। मयारी तालीम नही होने की वजह से युवाओं कमतर हांका जाता है। लोकडाऊन-5 गुजरने को है। लोकडाऊन मे घरो मे बैठकर अगर उक्त मुद्दों पर मामूली भी मंथन किया होगा तो भविष्य मे अंधेरा ही अंधेरा नजर आया होगा। उक्त अंधेरे से निकलने का रास्ता मयारी तालीम पाने ही मात्र उपाय नजर आया।
               कुल मिलाकर यह है कि लोकडाऊन-5 चल रहा है। लोकडाऊन की शुरुआत से लेकर अब तक काफी समय घर पर निठल्ले बैठने का अवसर मिला है। बैठकर खूब मंथन भी हुवा होगा कि ऐसे हालात मे हम कहां आकर ठहरे है। जदीद तालीम की अहमियत का भी पुरी तरह अहसास हुवा होगा। जदीद तालीम से समुदाय को दूर रखने वाले साजिशकर्ताओ की असलियत का भी अहसास हुवा होगा। अभी भी समय है कि दीन को सही तरिके से समझकर जदीद तालीम की अहमियत को पहचान कर तालीम को पूरी तरह अपना लेना होगा। वरना आगे हालात ओर भी बदतर हो सकते है।


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