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भारतीय संविधान : एक विश्लेषण      

 


       भारत का संविधान सामजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में अतीत की आधारशिला पर वर्तमान के परिष्कार, परिवर्धन, परिवर्तन और नवीन जीवन मूल्यों पर भविष्य की दिशा निर्धारण का जीवंत दस्तावेज है l इसमें अतीत के गौरव का समावेश, औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था का प्रतिकार और स्वतंत्रता संग्राम के समक्ष उपस्थित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से मुक्ति का विधान है l जिसे भारत के लोगों ने संविधान सभा में एकमत होकर 26 जनवरी, 1949 को भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में स्वीकार कियाl              संविधान का मूलभूत ढांचा दल विहीन लोकतंत्र है l यह संविधान की प्रस्तावना, अनुच्छेद 80-राज्यसभा, अनुच्छेद 81-लोकसभा, अनुच्छेद 170-विधानसभा और अनुच्छेद 171-विधानपरिषद, अनुच्छेद 243-C पंचायतों की संरचना और अनुच्छेद 243-R- नगरपालिकाओं की संरचना से स्पष्ट है l यह सुस्थापित तथ्य है कि संविधान देश के वयस्क मताधिकार प्राप्त नागरिकों द्वारा प्रतिनिधित्व प्रणाली के माध्यम से संचालित होना चाहिए l इस प्रणाली की अनिवार्य शर्त है कि इसमें व्यक्ति नहीं देश का नागरिक ही भाग लेगा l
        संविधान का मूलभूत ढांचा दल विहीन लोकतंत्र है इसे संविधान का समग्रता में अनुशीलन से समझा जा सकता है l संविधान संपूर्ण भारत और भारत के लोगों की इच्छा, आकांक्षा और भविष्य की नीतियों का लिखित दस्तावेज है l इसीलिए सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों को सदन के अविभाजित सदस्य के रूप में स्वीकार किया गया है, प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री के चयन की व्यवस्था की जगह उसकी नियुक्ति का प्रावधान किया गया l चिंतन का विषय यह है कि प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सन्दर्भ में राष्ट्रपति और राज्यपाल को अनुच्छेद-75 और अनुच्छेद-163 के अंतर्गत यहाँ तक अधिकार प्रदान किया गया कि वह निर्वाचित सांसदों और विधायकों के बाहर के किसी नागरिक को, जो उस पद का प्रत्यासी होने की योग्यता रखता हो, नियुक्त कर सकता है l इससे स्पष्ट है कि संविधान दलों को वयस्क मताधिकार में शामिल करने का निषेध करता है l
 किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित होने की प्रथम और अनिवार्य शर्त है कि व्यक्ति देश का नागरिक हो l जो व्यक्ति देश का नागरिक होगा वही वयस्क मताधिकार आधारित निर्वाचन प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग द्वारा अनुच्छेद-324 के अंतर्गत शामिल किया जा सकेगा l प्रतिनिधि निर्वाचित होने के पूर्व व्यक्ति को प्रत्यासी बनने की योग्यता पूरी करनी होगी, जिसकी प्रथम और अनिवार्य शर्त है देश का नागरिक होना, जो अनुच्छेद 80, 81, 170,171, 243-C और 243-R से स्पष्ट है l            


         ध्यातव्य है कि संविधान ने निर्वाचन-प्रकिर्या में व्यक्ति को भाग लेने की व्यवस्था नहीं की है क्योकि नागरिक अनिवार्यतः व्यक्ति होता है लेकिन व्यक्ति नागरिक हो यह आवश्यक नहीं है l इससे स्पष्ट होता है कि जो प्रत्यासी बनने की योग्यता रखता होगा वही निर्वाचन-प्रक्रिया में शामिल होगा और उसे ही चुनाव-चिन्ह प्रदान किया जाएगा l लेकिन निर्वाचन आयोग चुनाव-चिन्ह आरक्षण एवं आवंटन आदेश, 1968 के द्वारा राजनितिक दलों के पक्ष में चुनाव-चिन्ह आरक्षित करता है, जबकि राजनीतिक दल न तो नागरिक हैं और न ही व्यक्ति है l इसलिए इनके पक्ष में चुनाव-चिन्ह का आरक्षण संविधान की मूलभावना के विपरीत है l इससे पूरी व्यवस्था सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप में विभाजित हो जाती है l     नागरिकों को प्रदत्त मूलभूत अधिकारों के विपरीत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के पक्ष में चुनाव-चिन्ह आरक्षित करने से देश का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवेश, व्यवस्था और सदन दलीय हितों में विभाजित हो गया l


       संविधान में प्रावधान न होने के बावजूद बहुमत प्राप्त व्यक्ति, दल या गठबंधन राष्ट्रपति और राज्यपाल के समक्ष दावा प्रस्तुत करता है, सांसदों और विधायकों की परेड कराता है या समर्थन में हस्ताक्षरित-पत्र प्रस्तुत करता है l जब बहुमत सदन के बाहर ही निर्धारित हो गया तो नियुक्ति का प्रावधान और सदन में बहुमत सिद्ध करने का क्या मतलब l यदि राष्ट्रपति और राज्यपाल प्रधानमन्त्री या मुख्यमंत्री नियुक्त करने के लिए बाध्य है तो वह उनका सलाहकार कैसे हो सकता है l     चुनाव-चिन्ह के आरक्षण से राज्यसभा, लोकसभा, विधानपरिषद और विधानसभा पक्ष और विपक्ष में विभाजित हो गया i जिस स्थान पर संपूर्ण भारत के नागरिकों के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठकर संपूर्ण भारत के नागरिकों के मूलाधिकारों, वर्तमान और भविष्य पर विचार-विमर्श करना था वहां आधे सांसद/विधायक सरकार के साथ होते है और लगभग आधे सरकार के विपक्ष में हैं l जबकि संविधान में पक्ष और विपक्ष का प्रावधान ही नहीं है l जहां प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री की नियुक्ति संपूर्ण भारत के लोगों के लिए होनी थी वहां दलीय प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री और कैबिनेट नागरिकों के लिए नियुक्त हो जाती है l              


    तत्पश्चात पूरी व्यवस्था सहित वह पार्टी कार्यकर्ता और प्रवक्ता के रूप में बोलता और प्रचार करता दृष्टिगोचर होता है l जिसका परिणाम यह होता है कि संविधान में मध्यावधि चुनाव का उपबन्ध न होने के बावजूद मध्यावधि चुनाव में धकेल दिया जाता है l एक देश एक चुनाव की व्यवस्था होने वावजूद पूरा देश वर्षभर चुनाव में ही व्यस्त रहता है l पांच वर्ष एक चुनाव का उपबन्ध होने के बावजूद राजनितिक दल जब चाहे चुनाव में देश को ले जाने की शक्ति रखते है और कहते हैं कि लोगों ने किसी को बहुमत नहीं दिया, जबकि निर्वाचन आयोग अपनी अधिसूचना में नागरिकों से केवल अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजने को कहता है बहुमत देने को नहीं l          


      भारत 15 अगस्त, 1947 में स्वतंत्र हुआ, पार्टियों के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था 1989 में की गई l चिंतन का विषय यह है कि पार्टियों के पंजीकृत होने बावजूद उनके चुनाव-चिन्ह 1968 में आरक्षित कर दिए गए अर्थात बच्चे के जन्म के पूर्व ही नामकरण, दल संविधान में नहीं लेकिन संसद दल-बदल कानून बना देती है, उनके लिए चुनाव नियम, 1961, 10वीं अनुसूची, 91 वां संसोधन एवं विपक्ष के नेता का वेतन, रेडियो और दूरदर्शन के मुफ्त प्रयोग का कानून, 1998 और सुविधाओं संबंधी कानून 1977 बना दिया जाता है जबकि संविधान की मूलभावना दलों के विपरीत नागरिकों के प्रति है l    राजनीतिक दलों को निर्वाचन-प्रक्रिया में शामिल करने का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि सभी पदों का राजनीतिकरण हो गया, दल का चुनाव-चिन्ह सांसद और विधायक के लिए नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण, संसदीय और विधानसभा क्षेत्र के स्थान पर दलों के कार्यालय महत्वपूर्ण, नागरिक हितों की अपेक्षा दलहित महत्वपूर्ण, नागरिक सेवा से अधिक पार्टी सेवा महत्वपूर्ण, मध्यावधि चुनाव दलों की इच्छा पर निर्भर और  एक देश एक चुनाव और पांच वर्ष एक चुनाव की व्यवस्था समाप्त l यदि वयस्क मताधिकार प्रक्रिया से राजनितिक दलों को संविधान की मूलभावना के अनुरूप प्रत्यक्ष भागीदारी से दूर रखा गया होता तो संविधान का मूलस्वरूप स्थापित होता, नागरिक की गरिमा को महत्व प्राप्त होता, समाज के प्रबुद्ध वर्ग और समाजसेवियों को राजनीति में समान अवसर उपलब्ध होंते, व्यवस्था में चुनाव, चयन और नियुक्तियां जनहित के आधार पर होतीं और पार्टी केन्द्रित व्यवस्था के स्थान पर “अंतिम-आदमी” केन्द्रित व्यवस्था होती l विभिन्न विधिवेत्ता अपनी पुस्तकों में उन तथ्यों का समावेश करके प्रस्तुत करते हैं जिनका संविधान में उल्लेख तक नहीं है और देश के नागरिक उसे ही स्थापित व्यवस्था के रूप में स्वीकार कर लेते हैं l 
                                                 (विजय कुमार पाण्डेय), अधिवक्ता


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