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कायमखानी बिरादरी को अब तो सोच-समझकर भविष्य के लिये कुछ तय करना ही होगा।


सीकर।
             राजस्थान की मूलरूप से मानी जाने वाली मुस्लिम समुदाय की कायमखानी बिरादरी के पूर्वजों के बलिदान व उनके सक्षमता हासिल करने के जज्बे के कारण उनको सभी स्तर पर एक अलग रुप से पहचाना जाता रहा है। कायमखानी बूजुर्गो के गौरवान्वित करने वाले किस्से व कहानियों से इतिहास भरा पड़ा जरूर होगा। लेकिन इस बिरादरी के तालूक से पिछले हफ्ते दो अलग अलग खबरे सामने आने पर कुछ लिखने का दिल किया तो माफी के साथ लिख देता हु।
              अवल खबर यह आई कि कायमखानी परिवार मे जन्मे ओर मामूली तौर पर वकालत करते हुये धीरे धीरे मेहनत के बल पर कामयाबी की मंजिल पाते हुये उडीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद की जस्टिस मोहम्मद रफीक साहब शपथ लेते है। दुसरी खबर यक्ष आई कि कायमखानी बिरादरी के बच्चों के लिये एक तरह से फौज मे आरक्षित 187 पदो की भर्ती का परिणाम आने पर मात्र 15 कायमखानी युवा ही उसमे पास हो पाये। यानि 187 पदो मे से 172 पद को हम हमारी अक्षमता के चलते भर ही नही पाये।
                  इसके पहले मै जाट बिरादरी से कुछ सबक लेकर कायमखानी बिरादरी को आगे बढकर कुछ करने की वकालत करु तो देखता हु कि एक समय था जब जाट बिरादरी खेतो मे महिनो रहकर फसल तैयार करके अनाज निकाल कर इकठ्ठा करते थे उससे पहले सरकारी लठेत उस किसान का पसीना सूखने से पहले उसकी मेहनत से निकाला अनाज का बडा हिस्सा उठाकर यानि छीन कर ले जाते थे। लेकिन आजादी के बाद जाट बिरादरी ने तय किया कि उनके बारे मे दूसरा क्या राय रखते है वो राय उनको रखने दो। पर जाट बिरादरी ने यह तय किया कि अब उन्हे अपने आपको बदले के लिये क्या किया जाना है। उन्होंने कड़ी मेहनत करके शिक्षा पाकर राज व सत्ता पर अपने हिसाब से कब्जा किया ओर हर सरकारी नोकरी मे आरक्षण कोटे के अतिरिक्त जनरल कोटे मे भी सेवा का मौका हाथ से जाने नही दिया व ना दे रहे।
             इसके विपरीत कायमखानी युवाओं को अपने दादा-पड़दादाओ का अहसान मानना चाहिए कि उनके त्याग व बलिदान के चलते उनको फौज की भर्ती मे एक तरह से अलग से आरक्षण मिला हुवा है वरना आज उनकी वो गत होती जिसकी कल्पना करना भी उनके  लिये मुश्किल होता।
           हालही मे कायमखानी बिरादरी के लिये आरक्षित 187-पदो पर भर्ती का परिणाम आने पर मात्र 15-बच्चों का सलेक्शन होने पर हमे तथ्यो को समझ कर कुछ सोचने पर मजबूर करता है कि इसके कारण क्या रहे है। कारणो पर कुछ लोगो से बात करने पर पता चला कि लिखित परीक्षा मे कम से कम 40 प्रतिशत अंक पाने की अनिवार्यता को तो काफी युवाओं ने पूरा किया पर आवश्यक दौड़ सीमा मे मात्र 15 युवाओं को छोड़कर बाकी सब असफल होने के कारण वो भर्ती नही हो पाये। युवाओं मे गुटखा-पान मसाला का सेवन व अन्य तरीकों से नशे का सेवन करने एवं दौड़ की लगातार प्रेक्टिस नही करने से हमारे युवाओं का दौड़ मे सफल नही होना प्रमुख कारण बताते है। 
              कायमखानी युवाओं के सामने मै एक उदाहरण के रुप मे जीक्र करना चाहता हु कि कायमखानी बिरादरी से ही तालूक रखने वाले डीडवाना तहसील के निम्बी गावं निवासी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मुमताज खान के पुलिस भर्ती सेवा के समय फिजीकल टेस्ट मे उनके दोड़ के रिकॉर्ड को देखकर सबक लेना चाहिए। जिस समय मोहतरम मुमताज खान की दौड़ चल रही थी उसमे नामी धावक व कालेज टोपर भी दौड़ मे साथ दौड़ रहे थे। लेकिन मुमताज खान ने जैसा दावा किया था उसी तरह उस पांच किलोमीटर की दौड़ मे सबको पीछे छोड़कर स्वयं अवल आये थे। इसके लिये मुमताज खान ने पूरे छ माह दौड़ की कड़ी प्रैक्टिस की थी।
                    कुल मिलाकर यह है कि कायमखानी युवाओं के सामने अभी भी समय है कि वो अपने अतीत को व दादा-पड़दादाओ की कुर्बानी एवं मेहनत को याद करते हुये 187-पदो की भर्ती मे मात्र 15 पदो पर सफलता पाने के बजाय 187- पदो को भरने के बाद भी सलेक्शन करने वालो को लगना चाहिए कि अभी भी बडी  तादाद मे काबिल युवा बच चुके है। इसमे फौज भर्ती एक मात्र उदाहरण है। बाकी सभी भर्तियों मे सफल होने के लिये जाट युवाओं से सबक हासिल करके उन जैसा परिणाम देने के बाद ही दशा मे बदलाव आ सकता है।


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