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भारत मे अब कांग्रेस पार्टी को अपने वजूद के लिये संघर्ष करना होगा।


जयपुर।
                दिल्ली चुनाव के बाद भारत की सबसे पूरानी राजनीतिक "कांग्रेस पार्टी" को अब अपने वजूद को बचाये रखने के लिये कड़ा संघर्ष करना होगा। अगर संघर्ष नही किया तो भारत से कांग्रेस का नाम गधे के सीर से जैसे सींग घायब हुये है। उसी तरह से राजनीतिक परिद्रश्य से कांग्रेस गायब हो सकती है।
        भारत का एक मात्र दिल्ली शहर ही मात्र ऐसा है जहां भारत के हर प्रांत के लोग रहते एवं उनमे से किसी ना किसी प्रतिशत मे वो दिल्ली के मतदाता की हेसियत से मतदान भी करते है। केजरीवाल के पहले लगातार पंद्रह साल तक शीला दीक्षित के नेतृत्व मे सरकार रहने के बावजूद 2015 की तरह 2020 के विधानसभा चुनाव मे एक भी सीट नही जीत पाने से अधिक गम्भीर बात यह है कि इस चुनाव मे कांग्रेस को मात्र दो प्रतिशत मत मिलना कांग्रेस के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है
            .  हालांकि कांग्रेस के नेता कतई मानने को तैयार नही होगे पर यह हकीकत है कि 1980 के बाद से स्वयं सेवक संघ की विचारधारा वाले अनेक नेताओं ने कांग्रेस पर उच्च स्तर का दबदबा कायम करके हर पोलिसी बनने मे अपना पूरा दखल कायम करके धीरे धीरे उसकी जड़ो को इतना खोखला कर दिया कि वो आज दो प्रतिशत मतो पर आकर अटक गई है। भाजपा के वर्तमान सांसदों मे करीब 167 सांसद ऐसे है जो पहले किसी ना किसी रुप मे कांग्रेस के रहे है। ओर अनेक कांग्रेस नेता आज भी अपने ब्यानो या फिर अन्य तरह से भाजपा की मदद करते नजर आते है।
               राहुल गांधी अच्छे जेहन व संघर्ष वाले वाले नेताओं की सूची मे रखा जा सकता है लेकिन राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के साथ ही विपक्षी नेताओं की जबान मे जबान मिलाकर स्वयं काग्रेस के नेताओं के एक धड़े ने राहुल गांधी की इमेज जनता मे बनाने का काम किया है उस इमेज से अभी उभर पाना मुश्किल है। चाहे कांग्रेस राहुल को फिर से अध्यक्ष बनाकर आत्मघाती कदम ही क्यो ना उठाये। कांग्रेस को चापलूसों की राय को दरकिनार करके प्रियंका गांधी को आगे लाकर जंग लड़ने पर विचार करना चाहिए। कांग्रेस मे एक अजीब नेताओं का झूंड काम कर रहा है कि मोतीलाल बोहरा जैसे बूजुर्ग नेताओं को लोकसभा व राज्यसभा से बाहर रखकर एक नये यूग के जनाधार वाले नेताओं को आगे लाना होगा वरना दिल्ली की तरह ही अन्य प्रदेशों मे भविष्य मे कांग्रेस को अपनी गत झेलनी होगी।
             चाहे नेता अपनी पीठ कितनी भी थप थपाये लेकिन कांग्रेस ने जिस दिन से युवा कांग्रेस व NSUI के  पदाधिकारियों का चुनाव करने का तरीका अख्तियार किया है उसी दिन से उक्त संगठनों का बंटाधार होना शुरू हुवा था जो अब भी जारी है। इसके पार्टी की ताकत व मजबूती को काफी नुकसान हुवा है। वैचारिक तोर पर कांग्रेस के विचारों से कतई मैल नही खाने वाले धनबल व भूजबल की ताकर पर उक्त संगठनों के सदस्य बन जाते है या फिर बना दिये जाते है जो मतदान के दिन पदाधिकारियों को चून तो लेते है फिर उनका कांग्रेस से किसी तरह का नाता भी नही रहता है। चुने गये पदाधिकारियों मे से अधिकांश पदाधिकारी एक स्वार्थ पुर्ति तक तो अपने आपको कांग्रेस कहते है। जब स्वार्थ पूर्ति मे अड़चन आती है तो वो दूसरी तरफ कूदी मारने से भी परहेज नही करते है। इस तरह की चुनावी प्रक्रिया से कांग्रेस वास्तव मे कमजोर हुई है ओर कमजोर हो रही है। चाहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दवाब के कारण जबान नही खोले।
                    कुल मिलाकर यह है कि जहां देश के हर कोने से तालूक रखने रहते हो उस दिल्ली के विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस दो प्रतिशत मतो पर आकर ठहर जाये इससे बडे घातक हालात पार्टी के लिये हो नही सकते। कांग्रेस को आत्ममंथन करके उन नेताओं से छुटकारा पा लेना चाहिए जो पार्टी पर बोझ बन चुके है। संघ प्रवृत्ति के नेता जिनकी जड़े काफी गहरी हो चुकी है। उन जड़ो को खोदकर फेंकना होगा। वरना वो नेता पार्टी जड़े खोदकर रखदेगे।


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