नई दिल्ली । “देश का पहला स्वतंत्रता आंदोलन बहादुर शाहज़फ़र के नेतृत्व में लड़ा गया था और देश के स्वतंत्रता की आख़री लड़ाई महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़ी गई, यही देश की अद्वितीय विरासत है, ये देश हमेशा से समावेशी और सेक्युलर रहा है और आगे भी रहेगा।” क़ुर्बान अली, वरिष्ठ पत्रकार।
उन्होंने कहा, “यह मुल्क सेक्युलर था सेक्युलर है और सेक्यूलर रहेगा। हमारे बच्चे जब स्कूल जाए तो उन्हें यह प्रस्तावना ज़रूर पढ़ाई जानी चाहिए ताकि वो एक अच्छे नागरिक और एक अच्छे भारतीय बन सके।”
उक्त बातें राजधानी दिल्ली के 'कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया' में आज शनिवार, 3 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण जन संवाद में साझा की गईं। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “भारतीय गणराज्य का पुनर्निर्माण: देश में संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना (Rebuilding the Republic: Restoring Constitutional Morality in India) था जो कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “पंथनिरपेक्ष” एवं “समाजवादी” शब्दों के ऐतिहासिक समावेशन की सालगिरह पर आयोजित किया गया था।
'हम भारत के लोग' बैनर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में देश के जाने-माने पत्रकार, कानूनी विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषकों ने अपने विचार साझा किए।
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील अवनी बंसल ने कहा कि “कोई तानाशाह यह नहीं कहता संविधान को बदल दो, तानाशाह संविधान को कानून के ही माध्यम से धीरे धीरे बदलता है। आप उस दिन का इंतजार मत कीजिए जब संविधान बदला जाएगा, RSS और बीजेपी के लोग रोज संविधान बदल रहे है। इसको बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। हम भारत के लोग जब तक जिंदा हैं यह संविधान ज़िंदा रहेगा।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शाहनवाज आलम ने कहा कि, “यह आयोजन सरकार को करवाना चाहिए था यह उसकी जिम्मेदारी है कि संविधान के कार्यक्रम जगह जगह करवाए लेकिन वो ऐसा नहीं करवाएगी। इंदिरा गांधी ने सेक्युलर शब्द संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया और उन्होंने अपनी जान देकर भी उसकी रक्षा की।”
उन्होंने कहा कि, “लोग कहते हैं इन पर मत बोलिए पोलराइजेशन हो जाएगा, ऐसे फ्रॉड लोगों का इलाज करना होगा चाहे कहीं भी हो। जब नेहरू जी ने अपना पहला चुनाव लड़ा तो उन्होंने लोगों से कहा कि प्रोग्रेसिव और सेक्यूलर भारत के लिए कांग्रेस को वोट करें। और यह प्रचार उन्होंने जालंधर से शुरू किया जहां विभाजन से पीड़ित लोग सबसे ज्यादा थे। यह साहस हम में होना चाहिए कि हम सेकुलर भारत के लिए वोट मांग सके।”
उन्होंने कहा, “जब इंदिरा जी की सुरक्षा में लगे सिख समुदाय के लोगों को हटाने के लिए उनसे कहा गया तो उन्होंने हत्या से पहले कहा था मैं एक सेक्यूलर मुल्क की प्रधानमंत्री हूं मैं धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं कर सकती। उन्होंने अपनी जान देकर भी इस सेक्युलर शब्द की रक्षा की।”
वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि, संविधान हम सभी को एक समान और नागरिक के रूप में देखता है, एक नागरिक की तरह बर्ताव करने की सीख देता है, हमें इसी विचार की पुनर्स्थापना करना होगा।
इस जनसंवाद में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा कि हमें इंक्लूसिव और समावेशी होने की ज़रूरत है, इस से ही देश में संवैधानिक व्यवस्था मज़बूत होगी। उन्होंने कहा कि भाजपा संविधान की प्रस्तावना से ये शब्द हटाना चाहती है और इसके लिए निरंतर प्रयास भी कर रही है, देश के लोगों को और पार्टियों को इसका विरोध करते रहना चाहिए, आज का यह कार्यक्रम भी इसी बात का प्रयास है।
मसीहुज्ज़मा अंसारी (चेयरमैन, NFYM) ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि विपक्ष की भी जवाबदेही तय करनी होगी। जब देश के नागरिकों के साथ अत्याचार होता है तो विपक्ष कहाँ होता है? वो सड़कों पर नज़र क्यों नहीं आता? लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है और ख़ासकर कि ऐसे समय में कब संविधान की मूलभावना ख़तरे में है तो इसकी रखा के प्रायस में विपक्ष की भूमिका नदारद है।
इसके अलावा हेमंत प्रधान, मुदस्सिर शम्स, रूबी अरुण, शरद जायसवाल, तमजीद अहमद, शिवराम बाल्मीकि. शोएब ख़ान, दीपक चोटीवाला, आरिफ़ अली तुर्क, मसूद ख़ान, शाहनवाज़ ख़ान, शम्सुल हसन, मिसबाहुल हक़, जैसे वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए।
इस अवसर पर देश के वरिष्ठ और प्रख्यात पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी सम्मानित किया गया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य वर्तमान समय में भारतीय संविधान के मूल्यों और 'संवैधानिक नैतिकता' के महत्व पर गहराई से चर्चा करना है। वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे लोकतांत्रिक संस्थाओं और गणतांत्रिक मूल्यों को और सुदृढ़ किया जा सकता है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ मोहम्मद ख़ालिद ख़ान ने किया। कार्यक्रम का आरम्भ राष्ट्रगान से किया गया और समापन संविधान की प्रस्तावना पढ़कर हुआ।
वक़्फ़ संशोधन बिल के विरोधियों को लखनऊ पुलिस द्वारा भेजा गया नोटिस असंवैधानिक, सुप्रीम कोर्ट ले एक्शन- शाहनवाज़ आलम
नयी दिल्ली, 11 अप्रैल 2025 . कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर वक़्फ़ संशोधन विधेयक के खिलाफ विचार रखने वाले नागरिकों के संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आज़ादी और विरोध करने के मौलिक अधिकारों के हनन करने का आरोप लगाया है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसलों की अवमानना पर स्वतः संज्ञान लेकर दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ कार्यवाई की मांग की है. शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि लखनऊ के कई नागरिकों को लखनऊ पुलिस द्वारा उनकी तरफ से वक़्फ़ संशोधन विधेयक के खिलाफ़ होने वाले संभावित प्रदर्शनों में शामिल होने का अंदेशा जताकर उन्हें नोटिस भेजा गया है. जबकि अभी नागरिकों की तरफ से कोई विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ भी नहीं है. सबसे गम्भीर मुद्दा यह है कि इन नोटिसों में नागरिकों को अगले एक साल तक के लिए उनसे शांति भंग का खतरा बताते हुए 50 हज़ार रुपये भी जमा कराने के साथ इतनी धनराशि की दो ज़मानतें भी मांगी जा रही हैं. शाहनवाज़ आलम ने कहा कि यूपी पुलिस यह कैसे भूल सकती है कि उसकी यह कार्यवाई संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन है जो नागर...

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