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मनुस्मृति के आधार पर सज़ा सुनाने वाले जज को बर्खास्त करे सुप्रीम कोर्ट- शाहनवाज़ आलम

 



लखनऊ, 14 दिसंबर 2025.
बहराइच के राम गोपाल मिश्रा की हत्या के आरोपी सरफराज को मनुस्मृति के आधार पर फाँसी की सज़ा सुनाने वाले जिला जज पवन शर्मा का न्यायपालिका में बने रहना न्यायपालिका का दुर्भाग्य है. ऐसे व्यक्ति को तत्काल पद से बर्खास्त कर देना चाहिए. इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट और यूपी के जिला अदालतों में घुसपैठ कर चुके आरएसएस की मानसिकता वाले जजों को चिन्हित कर बाहर निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी चाहिए.

ये बातें कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने साप्ताहिक स्पीक अप कार्यक्रम की 225 वीं कड़ी में कहीं.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती कि कोई जज उस मनुस्मृति के आधार पर सज़ा सुनाए जिस पुस्तक को ख़ुद बाबा साहेब अंबेडकर ने सार्वजनिक तौर पर जलाया था. यह न सिर्फ़ क़ानून और संविधान पर हमला है बल्कि जातिवाद के ख़िलाफ़ समानता के लिए अंबेडकर द्वारा किए गए संघर्ष को ख़ारिज करने की साज़िश है. उन्होंने कहा कि हत्या के मुकदमे में भारतीय दंड विधान के पास पर्याप्त धाराएँ हैं जिसके तहत हत्या के दोषियों को फाँसी की सज़ा दी जा सकती है. इसके पहले भी देश में हज़ारो लोगों को फाँसी की सज़ा देश की अदालतों ने दी है लेकिन उन्होंने आईपीसी की धाराओं के तहत ही ये सज़ाएं दीं कभी भी किसी धार्मिक शास्त्र के आधार पर सज़ा नहीं दी थी.

क़ानून द्वारा स्थापित व्यवस्था से किसी का प्राण लिया जाना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन किसी धार्मिक शास्त्र के आधार पर और वो भी जिसे सामाजिक न्याय के रास्ते में रोड़ा मानते हुए बाबा साहब अंबेडकर जैसे सामाजिक क्रांतिकारी ने जलाया हो, किसी की जान ली जाती है तो उसे साम्प्रदायिक और ग़ैर क़ानूनी हत्या ही कही जा सकती है. अगर सड़क की सांप्रदायिक हिंसक भीड़ की तरह ही जज भी कोर्ट के अंदर धार्मिक आधार पर हत्या करने का आदेश देने लगे तो फिर सड़क और कोर्ट में अंतर ही नहीं रह जाएगा. इसलिए इस फैसले का विरोध करना हर उस व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है जो क़ानून और संविधान में यकीन रखता है. 



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